जलवायु

चर्चा: COP30 में स्वास्थ्य पर कितना गंभीर रहा एजेंडा?

दुनिया लगातार गर्म होती जा रही है। ऐसे समय में चार विशेषज्ञ कहते हैं कि जलवायु से जुड़ी बैठकों में मानव स्वास्थ्य को बहुत ज़्यादा महत्व दिया जाना चाहिए।
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<p><span style="font-weight: 400;">जापान के टोक्यो शहर में एक बहुत गर्म गर्मी के दिन, लोगों को ठंडक देने के लिए उन पर पानी की फुहार डाली जा रही है।(फोटो: नेड स्नोमैन / ऐलमी)</span></p>

जापान के टोक्यो शहर में एक बहुत गर्म गर्मी के दिन, लोगों को ठंडक देने के लिए उन पर पानी की फुहार डाली जा रही है।(फोटो: नेड स्नोमैन / ऐलमी)

जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। ये एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इंसानों द्वारा फैलाए गए प्रदूषण के कारण जो बदलाव हो रहे हैं, उनका असर लाखों लोगों की सेहत पर पड़ेगा, चाहे भविष्य में प्रदूषण कम भी कर दिया जाए।

पिछले महीने ब्राज़ील में संयुक्त राष्ट्र की सालाना जलवायु बैठक हुई। इसे COP30 कहा जाता है। यह बैठक देशों के लिए एक और मौका थी, जहाँ वे मिलकर प्रदूषण कम करने, बढ़ती गर्मी के असर को कम करने और आने वाले गर्म भविष्य के लिए लोगों को तैयार करने पर बात कर सकें।

यह ek CATCH स्टोरी है।

यह रिपोर्ट डायलॉग अर्थ की कम्युनिटी अडाप्टेशंस टू सिटी हीट (CATCH) परियोजना का हिस्सा है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस परियोजना को वेल्कम से वित्तीय सहायता मिली है। डायलॉग अर्थ की सभी रिपोर्टें संपादकीय रूप से स्वतंत्र हैं।

यह बड़ी बैठक ब्राज़ील के बेलेम शहर में हुई। अंत में देशों ने जलवायु के लिए नए पैसे (क्लाइमेट फाइनेंस) का लक्ष्य तो तय किया, लेकिन कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर खुलकर बात करने से बचते रहे।

अंत में, बेलें में हुई इस विशाल बैठक में नए जलवायु वित्त लक्ष्य पर सहमति बनी, लेकिन जीवाश्म ईंधनों पर चर्चा से बचा गया। यहां हम चार विशेषज्ञों से पूछते हैं कि क्या COP30 मानव स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त साबित हुआ।

‘वार्ताओं का केंद्र भीषण गर्मी होनी चाहिए – जो जलवायु संकट का सबसे घातक पहलू है’

जेनी मिलर ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ एलायंस की कार्यकारी निदेशक हैं। यह संगठन स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है, जो जलवायु नीतियों पर कार्रवाई के लिए काम करता है।

(फोटो: ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ एलायंस)

हीटवेव और सूखे का स्वास्थ्य पर असर बहुत गंभीर है और लगातार बढ़ रहा है। 2023 में, इसकी वजह से 1981–2010 की तुलना में 10 करोड़ से ज़्यादा लोग खाद्य असुरक्षा का शिकार हो गए। 2024 में, गर्मी के कारण 600 अरब से अधिक काम के घंटे नष्ट हो गए, जिससे परिवारों के स्वास्थ्य और जीवन-स्तर पर बुरा असर पड़ा।

ये कठोर सच्चाइयाँ सरकारों को प्रेरित करनी चाहिए कि वे सबसे अधिक प्रभावित विकासशील देशों की मदद करें, ताकि वे खुद को इन बदलावों के अनुसार ढाल सकें और अपने समुदायों को मज़बूत बना सकें। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों पर भी काम करना ज़रूरी है।

हालाँकि COP30 में गर्मी और स्वास्थ्य पर कुछ चर्चाएँ हुईं, लेकिन यह मुद्दा नीतिगत बातचीत में साफ़ तौर पर नहीं दिखा, जहाँ यह ज़्यादा मज़बूत जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा दे सकता था।

सम्मेलन के दौरान बेलेम हेल्थ एक्शन प्लान लॉन्च किया गया। लॉन्च कार्यक्रम में बोलते हुए पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के प्रमुख जार्बस बारबोसा ने कहा,

“दुनिया भर में अब 60 करोड़ लोग गर्मी से जुड़ी बीमारियों के खतरे में हैं।” COP30 के हेल्थ पवेलियन में कई कार्यक्रम और सत्र गर्मी और स्वास्थ्य के संबंध पर केंद्रित थे। इसके अलावा, अन्य (गैर-स्वास्थ्य) पवेलियनों और स्थानों पर भी स्वास्थ्य से जुड़ी चर्चाएँ पहले से ज़्यादा हुईं।

इन सत्रों में गर्मी और कामकाजी लोगों के स्वास्थ्य, लोगों को गर्मी से बचाने में शहरों की भूमिका, शासन व्यवस्था, अलग-अलग क्षेत्रों के मिलकर गर्मी से बचाव के उपाय, और अत्यधिक गर्मी के जवाब में ठंडक (कूलिंग) से जुड़ी पहल शुरू करने पर भी बात की गई।

हालाँकि इस COP में पैनल सत्रों और अध्यक्षता से जुड़े कार्यक्रमों में गर्मी और उसके स्वास्थ्य प्रभावों पर पहले से कहीं ज़्यादा चर्चा हुई, फिर भी असली वार्ताओं (नेगोशिएशन्स) में इसका ज़िक्र बहुत कम था। कॉप की बातचीत काफ़ी तकनीकी होती है और जलवायु संकट से निपटने के तरीकों पर केंद्रित रहती है। लेकिन अगर इन चर्चाओं को यह नहीं बताया जाएगा कि गर्मी – जो जलवायु संकट का सबसे जानलेवा हिस्सा है – आम लोगों की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करती है, तो ये बातचीत मज़बूत जलवायु कार्रवाई की ज़रूरी तात्कालिकता को पूरा नहीं कर पाएगी।

“जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों को अभी भी सही तरह से नहीं पहचाना गया है।”

स्टेला हार्टिंगर लैंसेट काउंटडाउन लैटिन अमेरिका की निदेशक हैं। यह एक स्वास्थ्य पहल है जो उच्च गुणवत्ता वाले वैज्ञानिक शोध के ज़रिए जलवायु से जुड़ी नीतियों को दिशा देती है।

Stella Hartinger
(स्टेला हार्टिंगर द्वारा उपलब्ध कराई गई फोटो)

लैंसेट काउंटडाउन लैटिन अमेरिका की नई रिपोर्ट के लिए, 25 क्षेत्रीय शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने 17 देशों का सर्वे किया। इसका उद्देश्य यह जानना था कि इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर रहा है।

इस अध्ययन में 41 संकेतकों का उपयोग किया गया, जैसे कि कमजोर आबादी का हीटवेव (लू) के संपर्क में आना और गर्मी से होने वाली मौतों की आर्थिक लागत। हमारी रिपोर्ट एक साफ चेतावनी देती है:

“जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभावों के कारण भविष्य में मानव स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता जाएगा।”

तो क्या COP सम्मेलन ग्लोबल साउथ में मानव स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त काम कर रहे हैं?

हालाँकि जलवायु से जुड़ी चर्चाओं में स्वास्थ्य का महत्व बढ़ रहा है, लेकिन व्यवहार में इसे अभी भी उतनी प्राथमिकता नहीं मिल रही जितनी इस संकट की गंभीरता मांगती है – खासकर ग्लोबल साउथ में।

जलवायु परिवर्तन को आज भी ज़्यादातर एक पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखा जाता है, और इसके स्वास्थ्य पर सीधे पड़ने वाले प्रभावों को साफ़ तौर पर नहीं समझा जाता। इसका एक नतीजा यह है कि COP की वार्ता टीमों में स्वास्थ्य क्षेत्र की भागीदारी कम रहती है। इससे फैसलों में स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरतों को पूरी तरह शामिल करने की संभावना घट जाती है।

अगर हम आज लोगों की जान बचाना चाहते हैं, तो जलवायु कार्रवाई में स्वास्थ्य को साफ़ तौर पर शामिल करना होगा – इसके लिए पर्याप्त धन, ज़्यादा महत्वाकांक्षी कदम और ऐसे तंत्र चाहिए जो हमारे देशों की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप हों।

‘शहर मिलकर भीषण गर्मी से निपटने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं’

मार्क वॉट्स, कार्यकारी निदेशक, सी40 सिटीज़ (दुनिया भर के शहरों के मेयरों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क जो जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए काम करता है)

Mark Watts
 (फोटो © ब्लूमबर्ग फिलान्थ्रॉपीज़)

शहरों ने COP30 में हिस्सा लिया, और उससे पहले रियो में हुए C40 वर्ल्ड मेयर्स समिट में भी शामिल हुए। वे इस बात के ठोस सबूत लेकर आए कि अत्यधिक गर्मी अब जलवायु से जुड़ा सबसे जानलेवा खतरा बन चुकी है। साथ ही, वे इसके असर को कम करने के लिए कारगर समाधान भी लेकर आए।

रियो समिट में, 33 शहरों ने मिलकर C40 का कूल सिटीज़ एक्सेलरेटर शुरू किया, ताकि समाधानों को बड़े स्तर पर लागू किया जा सके और लोगों की जान बचाई जा सके।

फ्रीटाउन, फीनिक्स और सैंटियागो जैसे शहरों ने अपनी-अपनी गर्मी से निपटने की योजनाएँ घोषित कीं। इन 2026 की योजनाओं में ठंडा भोजन भंडारण, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणालियाँ और “पॉकेट फॉरेस्ट” शामिल हैं।

हमारी सह-अध्यक्ष और सिएरा लियोन के फ्रीटाउन की मेयर आकी-सॉयर ने अपने मुख्य भाषण में इस मुद्दे की तात्कालिकता को ज़ोर देकर बताया। इसके बाद दुनिया भर के मेयरों का अचानक खड़े होकर इस अहम मुद्दे पर एकजुटता दिखाना, मेरे लिए एक यादगार पल बन गया।

बेलेम में, हमें COP30 की CEO एना टोनी और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन के साथ मिलकर “बीट द हीट / अत्यधिक गर्मी के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान” लॉन्च करने का अवसर मिला।

इस पहल से अब तक 185 शहर जुड़ चुके हैं, जिससे COP30 के शुरुआती दिनों में गर्मी और स्वास्थ्य एक प्रमुख मुद्दा बन गया।

COP30 में जलवायु अनुकूलन (क्लाइमेट एडैप्टेशन) के लिए वित्त पोषण को तीन गुना करने का वादा, वार्ताओं का एक मज़बूत नतीजा था।

हालाँकि, हमें मुतिराओ निर्णय (COP30 का अंतिम दस्तावेज़) में जलवायु लचीलापन (क्लाइमेट रेज़िलिएंस) से जुड़ा पाठ काफ़ी कमज़ोर लगा। इसके अलावा, हमें यह देखकर निराशा हुई कि स्थानीय और राष्ट्रीय सरकारों के बीच अनुकूलन साझेदारियों के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था इन नतीजों में शामिल नहीं की गई।

‘स्वास्थ्य का मुद्दा लोगों का ध्यान कार्रवाई की ज़रूरत की ओर खींच सकता है’

पामेला टेम्पलर बोस्टन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और जीवविज्ञान शोधकर्ता। वह वहाँ के अर्बन बायोजियोसाइंस और पर्यावरणीय स्वास्थ्य स्नातक कार्यक्रम का नेतृत्व करती हैं।

इस बार COP में स्वदेशी समुदायों की भागीदारी पहले से कहीं ज़्यादा दिखाई दी। इससे बैठक में नई ऊर्जा आई। बेलेम में एक और अच्छी बात यह थी कि शहरों के स्तर पर काम करने वाले बहुत से लोग वहाँ मौजूद थे।
ज़ाहिर है, सभी लोग अंतिम दस्तावेज़ में ज़्यादा मज़बूत भाषा चाहते थे, खासकर जीवाश्म ईंधन को धीरे-धीरे खत्म करने के लिए एक साफ़ रोडमैप। COP की वार्ताएँ बहुत कठिन और काफ़ी धीमी होती हैं, और यह सम्मेलन लोगों की उम्मीद से भी ज़्यादा धीमा रहा।

हम हर साल छात्रों को COP में लाते हैं, और इस बार उनमें से एक ने मुझसे पूछा:

“इस सबका मतलब क्या है?”

इस सवाल ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। लेकिन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी है। बड़ा सवाल यह है:

“अगर यह सहयोग न हो, तो हम कहाँ होते?”

मुझे लगता है स्थिति और भी खराब होती।

ज़्यादा असर के लिए, हम जैसे लोग, शोधकर्ता, आदिवासी समुदाय और नागरिक समाज, पूरे साल इसमें शामिल रहें, सिर्फ COP के दो हफ्तों में नहीं।

स्वास्थ्य का मुद्दा इसमें मदद कर सकता है। कुछ लोगों के लिए जलवायु परिवर्तन को नज़रअंदाज़ करना आसान होता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि यह कहीं और, किसी और के साथ हो रहा है। लेकिन जब जलवायु परिवर्तन को मानव स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है, तो यह हम सभी को प्रभावित करता है।

अगर हम वार्ताकारों को यह साफ़ तौर पर समझा सकें कि जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर डालता है, तो मुझे लगता है कि इससे ज़्यादा देश उत्सर्जन कम करने के लिए मज़बूत कार्रवाई पर सहमत हो पाएँगे।

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