दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी पढ़ाई को मुश्किल बना रही है। शिक्षक बच्चों को लगातार ऐसे क्लासरूमों में पढ़ा रहे हैं जिनमे खतरनाक गर्मी लगती है। आमतौर पर ऐसे क्लासरूम पुरानी स्कूल बिल्डिंगों में हैं जिन्हें ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर बनाया गया था। यूनिसेफ का कहना है कि, 17 करोड़ से अधिक बच्चे 2024 में शिक्षा से इसलिए वंचित रहे क्योंकि उनके स्कूल हीट वेव के कारण बंद हो गए थे। निम्न और मध्यम आयु वाले देशों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा, ख़ासकर शहरों में जहाँ अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट के कारण तापमान और भी ऊपर चला जाता है।
बढ़ती गर्मी का भीषण स्तर तक पहुंचना स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डाल रहा है। अल्पकालिक प्रभावों जैसे डिहाइड्रेशन और हीट-स्ट्रोक से लेकर दीर्घकालिक प्रभावों में किडनी फेल होना जैसी समस्याएं शामिल हैं। और निश्चित रूप से, भीषण गर्मी के कारण पढ़ाई के हुए नुकसान का दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक असर होता ही है।
अर्बन हीट आइलैंड क्या है?
शहरों का तापमान अक्सर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा होता है। यह कई कारणों के एकसाथ होने से होता है, जैसे शहरों में पेड़ कम होते हैं जो छाया या ठंडक दे सकें, कंक्रीट और ईंट की इमारतें होती हैं जो ज़्यादा गर्मी सोखती हैं और शहरों में ऊर्जा का इस्तेमाल भी अधिक होता है जिससे अतिरिक्त हीट भी पैदा होती है। इस प्रभाव को अर्बन हीट आइलैंड (यू एच आई) इफ़ेक्ट के रूप में जाना जाता है।
दो साल पहले अर्जेंटीना में एक स्कूल ने भीषण गर्मी के कारण छात्रों को स्विमवियर में स्कूल आने की अनुमति देकर लोगों का ध्यान खींचा था। चीन में, क्लासरूमों में गर्मी को लेकर ऑनलाइन विवाद छिड़ गए हैं कि क्या इतनी गर्मी में पढ़ने से चरित्र निर्माण होता है या ये स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं। और अमेरिका में शोधकर्ता अब अलग अलग क्लासरूमों की निगरानी कर रहे हैं ताकि बेहद अधिक गर्म होती इमारतों से निपटने का कोई तरीका निकाला जा सके।
फिर भी, कितना तापमान पढ़ाई के लिए बहुत ज़्यादा है, ना ही कहीं भी इस बारे में पर्याप्त दिशानिर्देश हैं और न ही इस बारे में कि स्कूलों में गर्मी कम करने के क्या करना चाहिए।
सलाहों और नीतियों को तेजी से आगे बढ़ने की ज़रूरत है, ऐसा बढ़ती संख्या में विशेषज्ञों का मानना है।
क्लासरूम में गर्मी का प्रभाव
शोधकर्ताओं ने पक्के तौर पर यह साबित किया है कि गर्म क्लासरूम सीखना मुश्किल बना देते हैं। 2018 के एक अध्ययन ने 1 करोड़ अमेरिकी छात्रों के टेस्ट स्कोर का विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि “एयर कंडीशनिंग के बिना, स्कूल-वर्ष के तापमान में हुई हर 1F (0.56C) की बढ़ोतरी के कारण उस साल विद्यार्थी 1% कम चीज़ें सीख पाते हैं।
यह एक CATCH स्टोरी है
यह रिपोर्ट डायलॉग अर्थ की कम्युनिटी अडाप्टेशंस टू सिटी हीट (CATCH) परियोजना का हिस्सा है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस परियोजना को वेल्कम से वित्तीय सहायता मिली है। डायलॉग अर्थ की सभी रिपोर्टें संपादकीय रूप से स्वतंत्र हैं।
अन्य शोध बताते हैं कि गर्म क्लासरूम काम करने या सीखने की क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं, जो कि समान रूप से गर्म ऑफिस की तुलना में भी अधिक है। डेटा के अनुसार तापमान में एक समान परिवर्तन भी वयस्कों में ऑफिस के काम की तुलना में बच्चों में सीखने को ज्यादा प्रभावित करता है, हालांकि इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं। उपरोक्त 2018 के अध्ययन का नेतृत्व करने वाले जिसंग पार्क, जो अब पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में काम करते हैं, ने कुछ गर्म देशों में स्कूलों में छात्रों के ख़राब प्रदर्शन और परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक क्षमता में कमी के पीछे के जटिल कारणों को सुलझाने की कोशिश की है।
2018 के अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए, उनकी टीम ने 58 देशों और 12,000 अमेरिकी स्कूल जिलों के मानकीकृत उपलब्धि के आंकड़ों का निरीक्षण किया। उन्होंने इसमें विस्तृत मौसम और शैक्षणिक कैलेंडर की जानकारी जोड़ी और पाया कि जब स्कूल के दिनों में गर्मी बढ़ी तो विद्यार्थियों के सीखने में कमी आई, जिसे टेस्ट के माध्यम से मापा गया।
गर्म दिनों में हुई पढ़ाई में यह कमी जमा होती जाती है, और परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्तियों की कमाई की क्षमता कम हो जाती है। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर काम करने वालों के लिए, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
नेपाल: हिमालय में गर्मी के बीच शिक्षकों का संघर्ष
नेपाल में, हाल के वर्षों में हीट वेव ताक़त और लंबाई में बढ़ रही हैं. झुलसा देने वाली गर्मी से अधिक हिमालय की ठंड के लिए मशहूर इस देश में, क्लासरूमों में गर्मी से निपटने के लिए बहुत कम दिशानिर्देश मौजूद हैं।
विकास और राहतकारी संगठन मर्सी कॉर्प्स नेपाल की प्रभाव और संचार विशेषज्ञ कृति भुजू कहती हैं,
“नेपाल में हीट वेव एक आम खतरा बनती जा रही हैं। उनकी बढ़ती बारंबारता और तीव्रता के बावजूद, जोखिम आकलन और आपदा प्रबंधन योजनाओं में हीट वेव पर बहुत कम विचार किया जाता है।”
इस वजह ने संगठन को देश के दक्षिण में मधेश प्रांत के स्कूलों का सर्वेक्षण शुरू करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाया कि वहां भीषण गर्मी के कारण छात्रों की अनुपस्थिति बढ़ रही थी, और सिरदर्द और थकान की अधिक रिपोर्टें आ रही थीं, जिससे क्लास के दौरान छात्रों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता से समझौता हो रहा था।
“क्लासरूमों में ख़राब वेंटिलेशन था, बच्चों की संख्या अधिक थी, और कुछ मामलों में तो तापमान खतरनाक स्तर तक पहुँच गया, जिसके कारण छात्रों के स्वास्थ्य और सीखने के परिणामों पर सीधा असर पड़ा,” भुजू कहती हैं।
“फिर भी स्कूलों के पास तैयारी या निपटने के उपाय न्यूनतम स्तर पर ही थे।”
भुजू का कहना है कि गर्मी को नेपाल में उभरते संकट की तरह नहीं देखा गया है। आपदा प्रबंधन का ध्यान गर्मी जैसे धीमी गति से आने वाले संकट की जगह बाढ़, भूकंप और भूस्खलनों पर अधिक है। भुजू को उम्मीद है कि उनके सर्वे के परिणाम पॉलिसी, ख़ासकर स्थानीय गर्मी-प्रबंधन योजनाओं और गर्मी-रोधी बुनियादी ढांचे में योगदान कर सकते हैं.
“हीटवेव की तैयारी को व्यापक स्कूल सुरक्षा रूपरेखा में जोड़ना एक महत्वपूर्ण कदम होगा।,” भुजू छात्रों और उनकी शिक्षा को हर तरह के खतरों से बचाने की यूनिसेफ की वैश्विक नीति का उल्लेख करते हुए कहती हैं।
ब्रिटेन: अमीर देशों में भी मुश्किलें
यूनाइटेड किंगडम, एक और देश जिसे आमतौर पर गर्म नहीं माना जाता, में शोधकर्ता पर्याप्त जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे ऐसी किसी भावी स्थिति से बचा जा सके जिसमें भीषण गर्मी के कारण स्कूली बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाएँ.
यॉर्क यूनिवर्सिटी में लिंडा डंलप जलवायु परिवर्तन शिक्षा और संधारणीयता (सस्टेनेबिलिटी) शोधकर्ता हैं और पॉल हडसन आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में काम करते हैं। दोनों ने साथ मिलकर 2024 की गर्मियों में देशभर के लगभग 300 स्कूलों के कर्मचारियों का सर्वे किया। उन्होंने पाया कि 90% उत्तरदाताओं ने हीटवेव का अनुभव किया था, जिनमे से ज्यादातर का कहना था कि उनपर इसका नकारात्मक प्रभाव तो पड़ा ही, उन्होंने विद्यार्थियों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव देखा। अभी तक प्रकाशित नहीं हुए इस सर्वे ने 85 स्कूलों की गर्म क्लासरूमों से निपटने की नीतियों पर भी गौर किया।
हडसन कहते हैं, “कम से कम यूनाइटेड किंगडम में स्कूलों के लिए आज भीषण गर्मी अनिवार्य रूप से बहुत बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन भविष्य में यह तेजी से चिंताजनक होती जाएगी।”
हडसन और डंलप का कहना है कि स्कूलों को संभालना कार्यस्थलों जितना आसान नहीं होता क्योंकि बच्चों और ऑफिस कर्मचारियों में काफ़ी अन्तर होता है। उदाहरण के लिए, एक हाई-स्कूल विद्यार्थी या शिक्षक की तुलना में एक प्राथमिक स्कूल के बच्चे के पास इतनी स्वतंत्रता या समझ नहीं होगी कि वो ख़ुद ही ठंडी जगह ढूँढ कर वहाँ जा सके।
अमेरिका: गर्मी को हराने के लिए बड़े स्तर पर निगरानी
अमेरिका में बोस्टन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ की पैट्रिशिया फेबियन ने अपने स्थानीय इलाके के एक स्कूल जिले से एक विशाल डेटा सेट एकत्र किया है। उनकी टीम ने स्कूली बिल्डिंगों के 3600 से अधिक कमरों में लगे हीट और एयर क्वालिटी (वायु गुणवत्ता) सेंसरों का इस्तेमाल किया। उनके परिणाम दिखाते हैं कि एक गर्म दिन को एक ही स्कूल बिल्डिंग में सबसे ठंडे और सबसे गर्म क्लासरूम के तापमान में 14C से अधिक का अन्तर हो सकता है।
फेबियन कहती हैं कि इस डेटा को इकठा करने और कक्षाओं में सेंसर लगाने से तुरंत समाधान किया जा सकता है, जैसे बिल्डिंग के ठंडे हिस्से में जाना, या बिल्डिंग के शेष हिस्से के अधिक गर्म ना होने की स्थिति में भी किसी विशिष्ट कमरे में विंडो एयर-कंडीशनिंग यूनिट को चालू करना. (विंडो यूनिट सस्ते में लगाए जा सकते हैं, लेकिन पूरी इमारत को ठंडा करने के लिए बनाए गए केंद्रीय सिस्टम की तुलना में इन्हें चलाने में ज़्यादा ऊर्जा खर्च होती है।)
फेबियन कहती हैं, “स्कूलों में संसाधन सीमित होते है इसलिए अगर वे नमूने लेकर पता कर सकें कि आंतरिक वातावरण कि स्थिति क्या है – चाहे वह तापमान हो, कार्बन डाइऑक्साइड हो या कुछ और – तो वे सटीक रूप से पहचान कर सकते हैं कि किस कक्षा में समस्या अधिक हो सकती है।”
फेबियन के अनुसार, ऐसे आंकड़े स्कूल प्रशासकों की दीर्घकालिक रणनीतियों में भी अपना योगदान दे सकते हैं: “वे ये फैसले ले सकते हैं कि संसाधनों को मुख्य रूप से कैसे इस्तेमाल करना है, एयर कंडीशनिंग पर या वृक्षारोपण पर, या वे हीट एक्शन प्लान के बारे में फैसले ले सकते हैं।” हीटवेव के दौरान यह भी संभव है कि किसी छात्र के लिए स्कूल से अधिक ठंडी उपलब्ध ही नहीं हो।
2024 के एक सर्वे के अनुसार, अमेरिकी स्कूल औसतन लगभग आधी सदी पहले बनाए गए थे। इन इमारतों का निर्माण आज की जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हुआ था। नेपाल से लेकर यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका और उससे भी दूर दराज के क्षेत्रों में जहाँ अतीत में शैक्षणिक वर्षों में तापमान नरम रहा है, ऐसे स्कूलों में एयर-कंडीशनिंग या गर्मी से निपटने के अन्य तरीकों के मौजूद होने की संभावनाएं कम हैं।
स्कूली गर्मी के समाधान की तलाश
नेपाल में कक्षाओं के गर्म होने की अधिकतम सीमा है या नहीं, इस सवाल पर, भुजू बेहद छोटा जवाब देती हैं, “सटीक तौर पर नहीं,” वह आगे कहती हैं कि हालांकि पिछले साल लागू हुई एक सरकारी नीति “हर स्थानीय स्तर” पर मौसम की निगरानी को अनिवार्य ज़रूर बनाती है।
हालांकि कुछ देशों और क्षेत्रों ने इनडोर काम करने के लिए अधिकतम तापमान की सीमा लागू की है, लेकिन अधिकांश के पास अभी भी विशेषकर स्कूलों के लिए कोई राष्ट्रीय दिशा-निर्देश नहीं हैं।
हर अध्ययन इस बात पर ज़ोर देता है कि प्रमाण-आधारित नीतिगत बदलावों को लागू करने के लिए तत्काल रूप से और भी डेटा की ज़रूरत है। इनमें, क्लासरूम कितने गर्म हो रहे हैं, कितना तापमान विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए बहुत ज़्यादा गर्म है, कब स्कूल बंद करने चाहिए, और चीज़ों को ठंडा करने के लिए सबसे बेहतर तरीका क्या है, जैसे डेटा शामिल हैं।
गर्मी से निपटने के लिए समाधानों को दो बड़े हिस्सों में बांटा जा सकता है:
इंफ्रास्ट्रक्चर यानी मूलभूत ढांचागत बदलाव जैसे छाया, ज़मीन का हरियालीकरण और एयर कंडीशनिंग; तथा व्यवहारिक बदलाव जैसे स्कूल यूनिफार्म के नियमों में परिवर्तन, बाहर हैट पहनना, कक्षाएं ठंडे कमरों में लगाना और पानी पीने के लिए ज़्यादा ब्रेक देना।
ज्यादातर स्कूलों में एयर कंडीशनिंग (आमतौर पर विंडो आधारित एसी यूनिट का प्रयोग करके) ही एक ऐसा बदलाव है जिससे बच्चों की उपस्थिति बनाए रखना संभव होगा।
“भीषण गर्मी भविष्य में तेजी से चिंताजनक होती जाएगी”पॉल हडसन, यॉर्क यूनिवर्सिटी में शोधकर्ता, यूनाइटेड किंगडम के स्कूलों के भावी खतरों के बारे में
मालदीव में, शिक्षा मंत्री इस्माइल शफ़ीऊ ने घोषणा की है कि कूल स्कूल प्रोजेक्ट के अंतर्गत 2025 के अंत तक देश के 3,704 क्लासरूमों में एयर कंडीशनिंग यूनिट लगाई जाएँगी। अमेरिका में, जून 2020 की गवर्नमेंट एकाउंटेबिलिटी ऑफिस की एक रिपोर्ट के अनुसार 41% पब्लिक स्कूल जिलों में कम से कम आधे स्कूलों में हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग सिस्टमों को बदलने या अपडेट करने की ज़रूरत है। देशभर में ऐसे स्कूलों की संख्या 36,000 है।
लेकिन सस्ती नवीकरणीय बिजली की आपूर्ति के बिना, एयर कंडीशनिंग की आर्थिक और पर्यावरणीय कीमत बहुत ज़्यादा होती है। 2050 तक यूरोप और इंडिया में एयर-कंडीशनिंग के इस्तेमाल पर एक अध्ययन के अनुसार, और भी एयर कंडीशनिंग यूनिट लगाने से बिजली की माँग, यूरोप में 2% और भारत में 15% बढ़ सकती है। ऐसी बढ़ोतरी पर, भारत अकेले अतिरिक्त 12 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करेगा।
एयर-कंडीशनिंग एक अस्थायी उपाय हो सकता है जिससे विद्यार्थी पढ़ाई जारी रख सकें। लेकिन अगर स्कूलों को ठंडा और सुरक्षित रखना है तो हमें तापमान पर्याप्त रूप से कम रखने के और सतत तरीकों की अत्यंत ज़रूरत है।

