जब कोई व्यक्ति अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आता है, तो शरीर खुद को ठंडा करने की कोशिश में त्वचा की ओर ज़्यादा खून भेजने लगता है।
लेकिन ठंडा होने की यह कोशिश शरीर के अंदरूनी अंगों पर अतिरिक्त दबाव डालती है और अगर लंबे समय तक गर्मी बनी रहे, तो गंभीर अंग विफलता तक हो सकती है।
“इसके असर खास तौर पर दिमाग पर बहुत गंभीर होते हैं, हालांकि दिल और किडनी जैसे अंगों में भी हमने लंबे समय तक चलने वाली खराबी दर्ज की है,” अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में पर्यावरणीय स्वास्थ्य पर काम करने वाले शोधकर्ता जोनाथन ली कहते हैं।
ली उन गिने-चुने वैज्ञानिकों में से हैं जो इस समय अत्यधिक और लंबे समय तक पड़ने वाली गर्मी के असर को एक बेहद असुरक्षित और अक्सर नजरअंदाज किए गए समूह पर समझने की कोशिश कर रहे हैं—खुले में काम करने वाले लोग। ये लोग हमेशा से खराब मौसम का सामना करते आए हैं, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन उनके सामने मौजूद खतरों को तेजी से बढ़ा रहा है।
यह एक CATCH स्टोरी है।
यह स्टोरी डायलॉग अर्थ के कम्युनिटी अडैप्टेशंस टू सिटी हीट प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी में किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट को वेलकम से फंडिंग मिलती है। डायलॉग अर्थ की सभी सामग्री संपादकीय रूप से स्वतंत्र है।
मई में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 12 महीनों में दुनिया की लगभग आधी आबादी ने जलवायु परिवर्तन के कारण कम से कम 30 दिनों तक अत्यधिक गर्मी झेली है। रिपोर्ट में अत्यधिक गर्मी को ऐसे तापमान के रूप में परिभाषित किया गया है, जो 1991 से 2020 के बीच किसी इलाके में दर्ज किए गए तापमान के 90% से अधिक गर्म हों।
दुनिया भर में गर्मी के संपर्क में आने से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर कई अध्ययन मौजूद हैं। इनमें तुरंत होने वाली दिक्कतें, जैसे शरीर में पानी की कमी और लू लगना, और लंबे समय में होने वाली समस्याएं, जैसे किडनी फेल होना, शामिल हैं। लेकिन बहुत कम अध्ययन ऐसे हैं जो खास तौर पर उन लोगों की समस्याओं पर ध्यान देते हैं, जिनका कामकाज सड़क पर होता है, जैसे बाजार के व्यापारी या रेहड़ी-पटरी वाले। यह कहना है स्ट्रीटनैट इंटरनेशनल की एशिया समन्वयक नैश टाइस्मन्स का, जो 55 देशों के स्ट्रीट वेंडर्स यूनियनों को साथ लाने वाला संगठन है।
उनके मुताबिक, खासकर ग्लोबल साउथ में आंकड़ों और उनकी व्याख्या की कमी के कारण यह समझना मुश्किल हो जाता है कि विक्रेताओं के सामने समस्या कितनी बड़ी है। हालांकि, अनुभवों के आधार पर मिली जानकारियां बताती हैं कि अनौपचारिक क्षेत्र के कामगार, और खासकर स्ट्रीट वेंडर्स, बढ़ती गर्मी के कारण लगातार बढ़ते दबाव का सामना कर रहे हैं।
“उनके लिए जलवायु परिवर्तन पहले से ही साफ़ तौर पर महसूस किया जा रहा है। यह उन असुरक्षित हालात को और खराब करता है, जिनमें वे पहले से काम कर रहे थे। लोग इसके असर अपनी सेहत पर भी देख रहे हैं और अपनी आमदनी पर भी,” टाइस्मन्स कहती हैं।
उन्होंने ऑक्सफैम के साथ मिलकर कंबोडिया, वियतनाम और लाओस में एक फील्ड स्टडी का नेतृत्व किया, जिसमें दर्जनों स्ट्रीट वेंडर्स से बातचीत की गई। करीब 77% लोगों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन उनकी सेहत और उनके काम-धंधे दोनों के लिए खतरा बन रहा है।
ली बताते हैं कि गर्मी से निपटने के लिए कामगार व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इनमें कूलिंग वेस्ट, गमछे या बंडाना और पंखे शामिल हैं। बहुत ज़्यादा गर्मी के हालात में शहर “हीट इमरजेंसी” घोषित कर सकते हैं और ऐसे सहायता केंद्र बना सकते हैं, जहां लोगों को ठंडी जगह मिल सके। लंबे समय के समाधानों में शहरों में छाया की व्यवस्था जैसे उपायों पर भी दुनिया भर में अध्ययन हो रहा है। किस शहर में कौन-सा उपाय सबसे बेहतर काम करता है, यह सवाल अब और ज़्यादा अहम होता जा रहा है।
बीमारी, आर्थिक नुकसान और आपात योजनाएं
एशिया के कई हिस्सों में स्ट्रीट वेंडर्स लंबे समय से बाढ़ और तूफानों का सामना करते आए हैं, जो उनकी जान और रोज़ी-रोटी दोनों के लिए खतरा रहे हैं। लेकिन अब गर्मी भी एक लगातार बनी रहने वाली समस्या बन गई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, एशिया दुनिया के औसत से लगभग दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है।
इससे होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के अलावा, बढ़ती गर्मी स्ट्रीट वेंडर्स की आमदनी को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।
“जब हम उनसे बात करते हैं, तो वे सबसे पहले आर्थिक नुकसान की बात करते हैं,” टाइस्मन्स कहती हैं।
गर्मी में ताज़ा खाना जल्दी खराब हो जाता है, जिससे लागत बढ़ जाती है और कई विक्रेता उतनी कीमत नहीं वसूल पाते। ज़्यादा तापमान के कारण ग्राहक भी कम निकलते हैं।
“दिन के सबसे गर्म समय में लोग बाहर नहीं निकलते, और यही समय आम तौर पर स्ट्रीट वेंडर्स के काम का होता है। कई लोग रात में दुकान लगाना चुनते हैं, लेकिन तब लोगों की आवाजाही पहले जैसी नहीं होती,” टाइस्मन्स कहती हैं।
टाइस्मन्स के समन्वय में हुई इस स्टडी के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी के दौरान कुछ विक्रेताओं की आमदनी में 30–40% तक की गिरावट आती है। जब बर्फ और पानी जैसे अतिरिक्त खर्च जोड़ दिए जाते हैं, तो आर्थिक असर और भी बढ़ जाता है। गरीबी स्वास्थ्य समस्याओं को और गंभीर बना देती है, क्योंकि लोगों के लिए पौष्टिक खाना खाना और इलाज कराना मुश्किल हो जाता है।
असुरक्षा से और बढ़ती संवेदनशीलता
दुनिया में अत्यधिक गर्मी से सबसे ज़्यादा प्रभावित जगहों में भारत शामिल है। नई दिल्ली शहर में 3.38 करोड़ लोगों को ऐसे तापमान का सामना करना पड़ता है, जो पिछले साल रिकॉर्ड 49 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।
दिल्ली में करीब 6.52 लाख स्ट्रीट वेंडर्स हैं। इनमें से 94% पुरुष और 46% महिलाएं हफ्ते में 48 घंटे से ज़्यादा काम करने की बात कहते हैं। यह जानकारी पिछले साल वीमेन इन इनफॉर्मल एम्प्लॉयमेंट: ग्लोबलाइज़िंग एंड ऑर्गेनाइजिंग (विएगो) द्वारा प्रकाशित शोध से सामने आई है।
ग्रीनपीस और नेशनल हॉकर फेडरेशन के 2024 के एक सर्वे के अनुसार, लू के दौरान आधे से ज़्यादा विक्रेताओं को सिरदर्द, पानी की कमी, थकान और मांसपेशियों में ऐंठन जैसी समस्याएं होती हैं।
अन्य घनी आबादी वाले शहरों की तरह दिल्ली ने भी इस समस्या से निपटने के लिए आपातकालीन हीट प्लान तैयार किए हैं। पिछले साल बनाए गए 2024–25 एक्शन प्लान में स्ट्रीट वेंडिंग को सबसे ज़्यादा संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इसमें ज़्यादा स्वास्थ्य केंद्र, बेहतर जल आपूर्ति और रात में व्यापार को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है। लेकिन यहां भी आंकड़ों की कमी कार्रवाई को मुश्किल बना देती है। स्ट्रीट वेंडर्स की संख्या और उनके फैलाव का कोई साफ़ रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह तय करना कठिन हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र कहां बनाए जाएं या पानी की सुविधा कहां बेहतर की जाए।
समाधान के तौर पर औपचारिकरण
जॉर्ज पेराल्टा ग्वाटेमाला के नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडिपेंडेंट वर्कर्स एंड वेंडर्स (फेंट्राविग) के महासचिव हैं। वे देश भर के 1.25 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स का प्रतिनिधित्व करते हैं।
“पिछले साल मैं मेडेलीन में एक फोरम में गया था, जिसने मेरी सोच पूरी तरह बदल दी,” वे डायलॉग अर्थसे कहते हैं। वे कोलंबिया स्थित जनरल यूनियन ऑफ इनफॉर्मल वर्कर्स के फोरम का ज़िक्र कर रहे थे। 2024 की इस बैठक में जलवायु परिवर्तन के सेहत पर पड़ने वाले असर पर एक प्रस्तुति दी गई थी।
“वहीं मुझे समझ आया कि जलवायु परिवर्तन पलायन को बढ़ावा देता है, लगातार धूप में रहने से त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है और यह हमारे काम की पूरी व्यवस्था को प्रभावित करता है।”
ग्वाटेमाला सिटी की ऊंचाई ज़्यादा होने के कारण यहां आमतौर पर 30 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान कम ही देखने को मिलता है। लेकिन यूनियन नेता बताते हैं कि हाल के वर्षों में शहर ने ऐसी लू झेली है, जिसमें तापमान 33 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि देश के अन्य हिस्सों में 40 डिग्री सेल्सियस तक तापमान दर्ज किया गया है।
इससे उन विक्रेताओं के लिए खास समस्याएं पैदा होती हैं, जो तयशुदा बाज़ारों में काम करते हैं। ये ढांचे अक्सर पुराने होते हैं और न तो गर्मी के लिए, न ही भीषण तूफानों के लिए तैयार होते हैं।
“ये जगहें पुरानी हैं, और भूकंप व बारिश इन्हें और भी ज़्यादा असुरक्षित बना देते हैं,” पेराल्टा कहते हैं। “छतें टिन की चादरों की बनी होती हैं, जो गर्मी में नीचे मौजूद सभी लोगों को झुलसा देती हैं। लेकिन स्ट्रीट वेंडर्स इससे भी ज़्यादा असुरक्षित हैं, क्योंकि वे सीधे तौर पर खुले में रहते हैं।”
पेराल्टा का मानना है कि एक बड़ी समस्या यह है कि स्ट्रीट वेंडर्स अनौपचारिक कामगार हैं और ज़्यादातर कर व्यवस्था, श्रम कानूनों, अनुबंधों और नियंत्रित कामकाजी हालात जैसी औपचारिक प्रणालियों से बाहर काम करते हैं। उनके अनुसार, अनुकूलन की दिशा में पहला कदम उनके काम को औपचारिक बनाना है। इसका मतलब है कर देना, और स्वास्थ्य बीमा, बिजली व पानी जैसी सेवाओं तक पहुंच, काम में आगे बढ़ने के मौके और छुट्टियों का अधिकार मिलना।
लैटिन अमेरिका के लिए स्ट्रीटनैट के प्रतिनिधि पैट्रिक केन कहते हैं कि स्ट्रीट वेंडर्स दोहरी मार झेलते हैं:
“पहला, क्योंकि वे औपचारिक आर्थिक व्यवस्था और उसके लाभों से बाहर हैं, और दूसरा, क्योंकि वे जलवायु परिवर्तन के खतरों का सामना कर रहे हैं और उनके पास कोई सुरक्षा नहीं है।”
केन के मुताबिक, ग्वाटेमाला और कुछ अन्य देशों में ट्रेड यूनियनें गर्मी से निपटने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। अनुकूलन से जुड़ा सबसे अहम कदम रोज़गार का औपचारिकरण माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ पानी पीने के केंद्र (हाइड्रेशन पॉइंट्स) और पर्यावरणीय शिक्षा जैसी पहलों का भी सुझाव दिया जा रहा है।
“उरुग्वे और ब्राज़ील में जलवायु न्याय को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है,” वे जोड़ते हैं।
पेरिस समझौते में शामिल देशों को हर पांच साल में अपनी जलवायु कार्ययोजनाओं को अपडेट करना होता है, ताकि वे ज़्यादा महत्वाकांक्षी कदम दिखा सकें। इन योजनाओं को नेशनलली डिटरमाइंड कॉन्ट्रिब्यूशंस (NDCs) कहा जाता है। लेकिन मौजूदा NDCs के तहत किए गए वादे इस सदी के दौरान वैश्विक तापमान बढ़ोतरी को केवल 2.6 से 3.1 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित कर पाएंगे, जो पेरिस समझौते के 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्यों से काफी दूर है।
इस साल अब तक जारी की गई कई नई योजनाओं में अनौपचारिक रोज़गार का बहुत कम ज़िक्र किया गया है। लैटिन अमेरिका में केवल इक्वाडोर ही ऐसा देश है, जिसने इसे एक मुद्दे के रूप में शामिल किया है। उसके NDC में नौकरी छूटने और अनौपचारिक काम को उन संरचनात्मक कारणों का हिस्सा बताया गया है, जो समाज को प्रभावित करते हैं और उसे ज़्यादा असुरक्षित बनाते हैं। हालांकि, इस NDC में स्ट्रीट वेंडर्स की स्थिति से निपटने के लिए कोई साफ़ नीतियां शामिल नहीं हैं।
एक ऐसा देश जहां औपचारिक व्यवस्था अनुकूलन के लिहाज़ से फायदेमंद साबित हुई है, वह है उरुग्वे। मोंटेवीडियो में एसोसिएशन ऑफ स्पेशल मार्केट वेंडर्स की नेता गैब्रिएला कैलांद्रिया बताती हैं कि गर्मी ने स्ट्रीट वेंडर्स के सामने कई समस्याएं खड़ी कर दी हैं। वहां इन्हें फेरियान्तेस कहा जाता है।
“हमने अब तक 15 मामले त्वचा कैंसर के दर्ज किए हैं, ऐसे लोग हैं जो निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) का शिकार होते हैं और यहां तक कि किसी को हार्ट अटैक भी पड़ा है,” वह बताती हैं।
लेकिन कैलांद्रिया के देश के स्ट्रीट वेंडर्स के पास अन्य देशों के वेंडर्स के मुकाबले कई फायदे हैं:
“यहां हमें राज्य द्वारा बहुत शामिल किया गया है। स्थानीय सरकार हमें नियंत्रित करती है। और हम अनौपचारिक नहीं हैं। हम कर चुकाते हैं, लगभग हम में से सभी।”
इसके अलावा, उन्हें ढके हुए बाजार क्षेत्रों, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन जैसी सुविधाओं तक भी पहुंच है।
कैलांद्रिया कहती हैं कि यह स्थिति अनोखी है: लैटिन अमेरिका में किसी अन्य देश में ऐसे हालात नहीं हैं।
“हालांकि सूरज सीधा हमारे ऊपर पड़ता है, लेकिन हमें सुरक्षा मिली हुई है।”
