सप्ताह के दिनों की सुबह, थेंगापट्टनम का तट हलचल से भरा रहता है, जो कि लगातार बारिश में भी कम नहीं होती। भारत के दक्षिणी सिरे पर कन्याकुमारी जिले में स्थित यह सबसे बड़ा मछली पकड़ने का बंदरगाह है, जहाँ की हवा व्यापारियों और नाव मालिकों के बीच की आवाज़ों और बातचीत से गूँजती रहती है।
पर स्थानीय मछुआरे तनाव में हैं। अगस्त में हुई एक घटना में भारत में वन्यजीव सरंक्षण के इर्द-गिर्द तनाव को सामने ला दिया है। मछुआरों द्वारा शार्क प्रजातियों की सही पहचान ना कर पाना, उनके लिए जुर्माने और कोर्ट मुकदमों की वजह बन सकता है।
थेंगापट्टनम, थूथूर का निकटतम बंदरगाह है, जो शार्क मछली पकड़ने के लिए प्रसिद्ध एक तटीय गाँव है। हर रोज़ इस बंदरगाह पर करोड़ों रुपए का कारोबार होता है जिसका एक बड़ा हिस्सा शार्क के मांस के इर्द-गिर्द घूमता है।
19 अगस्त को, अधिकारियों ने कई नावों से दैनिक पकड़ को जब्त कर लिया और मछुआरों को हिरासत में ले लिया। मछुआरों पर क़ानूनी रूप से सरंक्षित प्रजाति की शार्क रखने का आरोप लगाया गया था.
थूथूर के एक मछुआरे और नाव मालिक जूलियस कैस्पर कहते हैं, “अगस्त की घटना के बाद कुछ हफ़्तों तक, मेरी नाव सहित कई नावों ने शार्क पकड़ने से परहेज किया। इसलिए नहीं कि हम प्रतिबंधित प्रजातियों को पकड़ रहे थे और वन्यजीव कानूनों का उल्लंघन कर रहे थे, बल्कि [इसलिए कि] अधिकारियों के साथ कानूनी पचड़े में पड़ना सही नहीं था,” जूलियस कैस्पर 36 साल से अधिक समय से मछली पकड़ रहे हैं।
कैस्पर और अन्य लोग जिनकी दिनचर्या थेंगापट्टनम के इर्द-गिर्द घूमती है, अब अपनी मछली पकड़ने की सामान्य गतिविधियों पर लौट आए हैं। लेकिन उनका कहना है कि भारत के अस्पष्ट वन्यजीव कानून, और उन पर वन्यजीव विभाग का आक्रामक रुख, उनके सिर पर खतरे की तरह मंडरा रहा है।
थेंगापट्टनम की घटना
अगस्त की जब्ती के बाद, एक मछली व्यापारी और तीन नाव मालिकों पर एलोपिडे परिवार की शार्क, जिन्हें थ्रेशर शार्क के रूप में जाना जाता है, का व्यापार करने के लिए जुर्माना लगाया गया था। हालाँकि इन जानवरों का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियंत्रित है, लेकिन भारत में उन्हें पकड़ने और व्यापार करने के खिलाफ कोई नियम नहीं है। फेडरेशन ऑफ इंडियन फिशर ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष विंसेंट जैन, उन यूनियन प्रतिनिधियों में से एक हैं जिन्होंने आरोपियों की ओर से हस्तक्षेप किया है। उनका कहना है कि समूह पर कुल मिलाकर लगभग 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
मछुआरों का मानना है कि इस मामले में शामिल अधिकारियों ने संबंधित शार्क की गलत पहचान संरक्षित प्रजाति के रूप में की और गलत तरीके से दंड लगाया। थूथूर के लोगों का कहना है कि वे तब से फूंक-फूंक कर चल रहे हैं, और इस बात को लेकर आशंकित हैं कि अगर यह घटना दोबारा हुई तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
2 सितंबर को, इस तट के मछुआरों का प्रतिनिधित्व करने वाले ट्रेड यूनियनों ने पास के शहर तिरुवनंतपुरम में एक बैठक की, जिसमें बदलाव की मांग की गई। वे चाहते हैं कि गिरफ्तारियों की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाई जाए। वे यह भी चाहते हैं कि शार्क प्रजातियों और उन्हें लैंड करने (किनारे पर लाने) की वैधता की पहचान करने का बेहतर तरीका तैयार करने के लिए सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों, पुलिस और मछुआरों का एक पैनल बनाया जाए।
जैन का कहना है कि यह सिस्टम की समस्या है जिसका समाधान करने की ज़रूरत है। वह कहते हैं, ” सिर्फ़ 19 अगस्त की घटना में शामिल अधिकारियों की खुले तौर पर आलोचना करना व्यर्थ होगा। हम, मछुआरों के समूह, इसके लिए एक स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।”
जैन कहते हैं कि इसके लिए और भी व्यावहारिक और लचीले दृष्टिकोण की जरूरत है। अधिकारियों को शार्क पहचानने के तरीकों में सुधार करना चाहिए, और जब मछुआरे कुछ और पकड़ने की कोशिश करते समय गलती से संरक्षित प्रजातियों को पकड़ लें, तो उनके प्रति और नरम होना चाहिए। “लंबे समय में, मछुआरा समुदाय और अधिकारियों के बीच ऐसा स्वस्थ संबंध इन प्रजातियों के संरक्षण में मदद ही करेगा।”
नियम क्या कहते हैं
मछुआरों द्वारा लगातार शार्कों के शिकार से उनकी आबादी में गिरावट आ रही है। भारत सहित दुनिया भर के देश उनकी सुरक्षा के लिए प्रयास तेज कर रहे हैं।
भारत का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA) 1972 में स्थलीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए बनाया गया था। 2001 में, “सभी शार्क और रे प्रजातियों” की मछलियों के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया गया था। देश भर के मछुआरा समुदायों के भारी विरोध के बाद, आदेश को 10 शार्क और रे प्रजातियों तक सीमित कर दिया गया, जिसमें पांडिचेरी शार्क, गंगा शार्क, साही रे (porcupine ray) और नाइफ-टूथ सॉफिश शामिल हैं।
तब से शार्क मछुआरों और अधिकारियों के बीच मामला काफी हद तक शांत रहा है। लेकिन 2022 में WPA में हुए संशोधनों ने उनके संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया है। इन संशोधनों को शार्क और रे की सुरक्षा के लिए एक अधिक मजबूत कानूनी ढांचा बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसके अंतर्गत कई समुद्री प्रजातियों को WPA की सबसे संरक्षित श्रेणियों में जोड़ा गया, जिन्हें अनुसूची 1 और अनुसूची 2 कहा जाता है।
अनुसूची 1 सबसे सख्त है, जिसमें वे समुद्री प्रजातियां शामिल हैं जिन्हें पकड़ना और जमीन पर लाना सख्त मना है। इस श्रेणी में व्हेल शार्क शामिल हैं। वहीं, अनुसूची 2 की प्रजातियों को पकड़ने की अनुमति नहीं है, लेकिन अगर गलती से मछुआरे इन प्रजातियों को पकड़ लेते हैं तो उन्हें किनारे पर ला सकते हैं। लेकिन इन मछलियों के शवों को निपटाने के लिए अधिकारियों को सूचित करना ज़रूरी है। अनुसूची 2 में ग्रेट हैमरहेड शार्क शामिल हैं। थ्रेशर शार्क कभी भी अनुसूची 1 या 2 का हिस्सा नहीं रही हैं।
थेंगापट्टनम के मछुआरों का कहना है कि वे शायद ही कभी अनुसूची 1 और 2 में सूचीबद्ध प्रजातियों को लाते हैं। अपवादस्वरूप व्हेल शार्क या समान रूप से दुर्लभ ओशियानिक व्हाइटटिप शार्क कभी कभार फँस जाती हैं जो अन्य प्रजातियों के साथ मिल जाती है। लेकिन अगस्त की गिरफ्तारियों और WPA तथा लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के ओवरलैपिंग नियमों ने भ्रम और चिंता पैदा कर दी है।
क्या टेक्नोलॉजी शार्क की पहचान करने में मदद कर सकती है?
दक्षिणी भारत के कोच्चि में केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक एल्डो वर्गीस का मानना है कि टेक्नोलॉजी भारत की शार्क की पहचान करने की समस्या का समाधान हो सकती है।
उन्होंने मार्लिन नाम का एक मोबाइल ऐप बनाया है जो मछुआरों को मछली पकड़ने से संबंधित डिजिटल जानकारी साझा करने की अनुमति देता है। वर्गीस अब अपने इस ऐप में एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित टूल भी जोड़ने की उम्मीद कर रहे हैं जो प्रजातियों की पहचान कर सके। वर्गीस कहते हैं, “प्रजातियों की पहचान कर पाने के लिए सबसे बड़ी बाधा एक मजबूत चित्र-आधारित डेटाबेस बनाना है। हालांकि शोधकर्ता, वन्यजीव संगठन और वैज्ञानिक इसे बनाने में हमारी मदद कर सकते हैं, लेकिन बेशक उस जानकारी के मुख्य स्रोत मछुआरे ही होंगे, जो समुद्र में जाते हैं और नियमित रूप से विभिन्न प्रकार की प्रजातियों का सामना करते हैं।”
मत्स्य पालन या वानिकी?
मछुआरों और वन्यजीव अधिकारियों के लिए शार्क की पहचान करने की मुख्य चुनौतियों में से एक यह है कि कुछ प्रजातियों और उप-प्रजातियों के बीच का अंतर इतना कम होता है कि नंगी आँखों से उनमें अन्तर कर पाना बेहद मुश्किल है।
डायलॉग अर्थ ने सीएमएफ़आरआई के फिनफिश मत्स्य पालन विभाग की प्रमुख शोभा जो किझाकुदन से बात की। वह इस बात से सहमत हैं कि समुद्री प्रजातियों की पहचान करने में अधिकारियों और मछुआरों दोनों को शिक्षित करना अनिवार्य है। संस्थान ने मछुआरों के बीच ज्ञान बढ़ाने के लिए कई प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए हैं।
राज्य वन्यजीव और वानिकी विभाग 19 अगस्त जैसे निरीक्षण करता है, लेकिन इन निरीक्षणों में प्रासंगिक अधिकांश कानून स्थलीय प्रजातियों पर केंद्रित होते हैं। मछली प्रजातियों के लिए ज़रूरी विशेषज्ञता मत्स्य विभाग के पास है, जो कि एक अलग भाग है।
किझाकुदन बताती हैं कि स्थलीय जंगली जानवरों का शिकार या अवैध शिकार समुद्र में होने वाली घटनाओं से काफ़ी अलग है, जहाँ संरक्षित प्रजातियां आसानी से लाइनों या जालों में मुख्य शिकार के साथ गलती से फंस सकती हैं। वह आगे कहती हैं, “हमारे संगठन ने पहले ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से औपचारिक रूप से अपील की है कि समुद्री जीवों के लिए एक अलग वन्यजीव ढांचा बनाया जाए।“
19 अगस्त की गिरफ्तारियों के बाद, थेंगापट्टनम के एक मत्स्य निरीक्षक ने डायलॉग अर्थ को बताया कि वन्यजीव और वानिकी विभाग ने उन्हें छापे के बारे में पहले से सूचित नहीं किया था। उन्होंने स्वीकार किया कि निरीक्षण और दंड के मामले में इन विभागों के बीच संचार की कमी है।
सतीश कुमार तमिलनाडु वन और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के उप निदेशक हैं। यह ब्यूरो खुफिया जानकारी इकट्ठा करता है और वन्यजीव और वानिकी विभाग को रिपोर्ट करता है। कुमार का कहना है कि 19 अगस्त से पहले कई दिनों तक दर्ज किए गए अवलोकनों से पता चला था कि संरक्षित शार्क और रे को किनारे पर लाने की कई घटनाएँ हुई थीं, और विभाग का निरीक्षण ठोस सबूतों के आधार पर किया गया था। उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि ब्यूरो के अनुसार किन प्रजातियों का शिकार हो रहा था।
मछुआरे जोर देकर कहते हैं कि वे कानून का पालन कर रहे हैं, लेकिन अधिकारी बस अपनी शार्क पहचान में गड़बड़ी कर रहे हैं।
थेंगापट्टनम के लिए आगे क्या?
जेरिकसन थूथूर के मूल निवासी हैं जो मछली पकड़ने वाली नाव चलाते हैं और मछली व्यापारी के रूप में काम करते हैं। वह 19 अगस्त को थेंगापट्टनम में मौजूद थे, लेकिन उन लोगों में नहीं थे जो गिरफ़्तार हुए थे या जिनपर जुर्माना लगा था।
जेरिकसन कहते हैं, “वन्यजीव अधिकारी उससे पहले कुछ दिनों तक बंदरगाह के आसपास घूम रहे थे, और निरीक्षण कर रहे थे। हमने इस पर बहुत ज्यादा नहीं सोचा। थेंगापट्टनम एक बहुत बड़ा बंदरगाह है। हर सुबह सैकड़ों नावें यहाँ आती हैं।” उनका कहना है कि जब हफ्तों तक समुद्र में रहने वाली कई नावें बंदरगाह पर पहुंचती हैं, उन दिनों में मछली का व्यापार 30 करोड़ रुपए तक पहुँच सकता है।
जेरिकसन को डर है कि अगले साल अप्रैल और मई में तमिलनाडु के राज्य विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद, और भी अधिकारी शार्कों का निरीक्षण करने आएँगे और संभावित रूप से उनकी ग़लत पहचान भी करेंगे।
फ़िलहाल, मछली पकड़ने वाले समुदायों से वोट सुरक्षित करने की ज़रूरत के कारण ऐसे छापों में शांति आई है।
जेरिकसन और थेंगापट्टनम के अन्य मछुआरे मानते हैं कि अगर संरक्षित प्रजातियों, विशेष रूप से शार्क की पहचान करने के लिए एक बेहतर सिस्टम होता, तो यह सबके लिए फायदेमंद होता।
वह नीलामी का इंतज़ार कर रही एक हैमरहेड शार्क की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “आप देखिए… हम… एरो-हेडेड हैमरहेड को पकड़ सकते हैं, जबकि ग्रेट हैमरहेड और स्मूथ हैमरहेड को [पकड़ने] पर प्रतिबंध है। मछुआरे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं, और हम जानबूझकर उन्हें नहीं पकड़ते क्योंकि हम उन्हें पहचान सकते हैं। लेकिन मेरा सवाल यह है कि क्या जो अधिकारी हमारी जांच कर रहे हैं, वे इस तरह के अंतर के जानकार हैं?”
यह सवाल भारत के शार्क मछुआरों और उन पर निगरानी रखने वालों लिए लिए मुश्किल बना हुआ है।

