जलवायु विचार: कॉप 28 में तेल कंपनियों से नेतृत्व की नहीं, जवाबदेही की ज़रूरत है एक तेल कंपनी के सीईओ की अध्यक्षता में दुबई जलवायु शिखर सम्मेलन जल्द ही होने जा रहा है। जीवाश्म ईंधन के उत्पादकों से हमें जलवायु नेतृत्व का वचन लेना ही चाहिए। हिन्दी हिन्दी English Share this article × Copy link to page Copy link to page × पुन: प्रकाशन अगर आप हमारी प्रकाशन नीति की शर्तों या सामग्री का उपयोग करने की अनुमति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो [email protected]पर हमें संपर्क करें। (फोटो: कामरान जेब्रेली / अलामी) ओमेर अहमद अक्टूबर 27, 2023November 13, 2023 अमेरिकी पत्रकार आनंद गिरिधरदास अपनी किताब विनर्स टेक ऑल: द् एलीट शरेड ऑफ चेंजिंग द वर्ल्ड में इस बात पर बारीकी से नज़र डालते हैं कि कैसे अरबपतियों द्वारा दिया गया दान रिफॉर्म यानी सुधार में मदद करने के बजाय इसमें बाधा डालता है। उनकी मूल थीसिस सरल है: वैश्विक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए बड़ी रकम देकर (या केवल प्रतिज्ञा करके), बहुत सारे अमीर न केवल प्रतिष्ठा और कर छूट प्राप्त करते हैं, बल्कि ‘समाधान’ को इस तरह से आकार देने में सक्षम हो जाते हैं कि वे इस जवाबदेही से बच निकलें। इस हास्यास्पद विचार का कि जो लोग इस समस्या के लिए जिम्मेदार हैं उनको ही इसके समाधान का नेतृत्व सौंप दिया जाए शायद इससे स्पष्ट कोई उदाहरण नहीं है जो हम जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधन और तेल कंपनियों के मामले में देख रहे हैं। इस साल का वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन, कॉप 28, दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित किया जाएगा। कॉप 28 के अध्यक्ष, सुल्तान अल जाबेर, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (एडीएनओसी) के सीईओ भी हैं। कैंपेन ग्रुप ग्लोबल विटनेस के अनुसार, एडीएनओसी इस दशक में तेल और गैस उत्पादन पर हर महीने एक अरब डॉलर से अधिक खर्च करने की योजना बना रहा है। (एडीएनओसी को इस विश्लेषण पर आपत्ति है।) अपनी नियुक्ति को लेकर जताए जा रहे संदेह को लेकर अल जाबेर ने अक्टूबर की शुरुआत में एक ऑयल कांफ्रेंस में उद्योग जगत की बड़ी हस्तियों से कहा, “आपके लिए दुनिया को यह दिखाने का मौका है कि आप वाकई में समाधान के केंद्र में हैं” और “परिणाम देने के लिए बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी और पूंजी लगाकर संशयवादियों को चुप कराने का समय आ गया है।” समस्या यह है कि हाल के वर्षों में जलवायु शिखर सम्मेलनों में तेल कंपनियों ने जो एकमात्र परिणाम दिया है, वह है प्रगति को रोकना। इस साल जुलाई में प्रकाशित एक ओपिनियन पीस में, क्रिस्टीना फिगुएरेस, जो 2010 से 2016 तक जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन की प्रमुख थीं और पेरिस समझौते को साकार करने में मदद की थी, ने स्पष्ट रूप से लिखा कि जीवाश्म ईंधन कंपनियां, ऊर्जा परिवर्तन में रचनात्मक रूप से भाग लेने में विफल रही हैं। और इसके बजाय इन कंपनियों ने नए जीवाश्म ईंधन स्रोतों की खोज करते समय स्वच्छ ऊर्जा नीतियों के खिलाफ पैरवी करना जारी रखा है। संक्षेप में कहें तो ये समस्या बने हुए हैं और ऐसा नहीं लगता कि इनमें कोई बदलाव आएगा। दमन और विलंब की घिसी-पिटी रणनीति भले ही, अल जाबेर ने कहा हो कि “जीवाश्म ईंधन का चरणबद्ध समापन अपरिहार्य है”, लेकिन इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि जीवाश्म ईंधन उत्पादक इसका नेतृत्व करेंगे। उसी सम्मेलन में जब अल जाबेर ने सुझाव दिया कि तेल कंपनियां, जलवायु परिवर्तन के समाधान का हिस्सा हो सकती हैं, तो पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के महासचिव हैथम अल-घैस ने कहा कि तेल में निवेश बंद करने का आह्वान “काउंटरप्रोडक्टिव” था। आधुनिक इतिहास में कोई भी प्रमुख औद्योगिक समूह कभी भी अपने ही द्वारा पैदा की गई समस्याओं के समाधान का हिस्सा नहीं रहा है। इस बात में किसी तरह का कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आधुनिक इतिहास में कोई भी प्रमुख औद्योगिक समूह कभी भी अपने ही द्वारा पैदा की गई समस्याओं के समाधान का हिस्सा नहीं रहा है, सिवाय इसके कि जब जवाबदेही लागू की गई हो। अमेरिका में, तम्बाकू कंपनियों ने 40 वर्षों से अधिक समय तक सिगरेट से कैंसर के खतरे के बारे में जानकारी छिपाई। कार कंपनियों ने कोई बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है। 1953 में, जीएम, फोर्ड, क्रिसलर और ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एएमए) प्रदूषण को कम करने के लिए संयुक्त रूप से प्रौद्योगिकियों पर शोध करने पर सहमत हुए, लेकिन फिर प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों को रोकने में एक दशक से अधिक समय लग गया। इस विरासत के नक्शेकदम पर चलते हुए, 2015 में जर्मन कार निर्माता फॉक्सवैगन ने 1.1 करोड़ डीजल वाहनों में हानिकारक उत्सर्जन को छिपाने के उद्देश्य से परीक्षणों को ‘धोखा देने’ के तरीके अपनाए थे। फॉक्सवैगन पर आरोप है कि उसने प्रदूषण जांच को चकमा देने वाला सॉफ्टवेयर लगाकर ये कारें बेचीं। यदि बिग टोबैको और बिग ऑटो इस तरह का व्यवहार करते हैं, तो बिग ऑयल अलग क्यों ही होगा? जलवायु परिवर्तन में जीवाश्म ईंधन की भूमिका के बारे में उपभोक्ताओं को “व्यवस्थित और जानबूझकर” गुमराह करने और “भ्रामक आचरण” में संलग्न होने के लिए एक्सॉनमोबिल सहित कई तेल दिग्गजों पर 2021 में, न्यूयॉर्क में मुकदमा दायर किया गया। चल रही जांच में 2006 से 2016 तक – पेरिस समझौते को अपनाने के एक साल बाद – आंतरिक एक्सॉनमोबिल दस्तावेजों का पता चला है कि किस तरह से कंपनी ने जलवायु परिवर्तन के विज्ञान और जीवाश्म ईंधन के साथ इसके संबंध पर संदेह पैदा करने की कोशिश की थी। इस दौरान, एक्सॉनमोबिल का नेतृत्व रेक्स टिलरसन ने किया, जो 2017-18 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विदेश मंत्री बने, जब ट्रंप ने पेरिस समझौते से अमेरिका की बाहर निकलने की घोषणा की। हमें कॉप 28 में जवाबदेही की ज़रूरत है जब भी बात कार्बन उत्सर्जन में कटौती की आती है तो जो भी आंदोलन हुए हैं, वे जीवाश्म ईंधन कंपनियों के विरोध में हुए हैं, उनकी वजह से नहीं हुए हैं। साधारण तथ्य यह है कि नवीकरणीय प्रौद्योगिकी को स्थापित करना अब अक्सर सस्ता होता है। यही मुख्य कारण है कि कार्बन उत्सर्जन का स्थिर होना शुरू हो सकता है। यह एक ऐसा उद्योग है जो सीधे तौर पर जीवाश्म ईंधन को चुनौती देता है, और तेल कंपनियों की एकमात्र संभावित भूमिका प्लास्टिक जैसे कुछ बिल्डिंग ब्लॉक्स प्रदान करना है। यदि कॉप 28 को पूरी तरह से मज़ाक़ नहीं बनना है, तो कुछ ऐसा होना चाहिए कि इसके अध्यक्ष के रूप में, एक ऑयल एग्जीक्यूटिव की केंद्रीय भूमिका, वास्तविक कार्रवाई के साथ मैच करे यानी मेल खाए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि यह केवल कार्बन कैप्चर जैसी साइंस फिक्शन बनकर रह जाए। यदि अल जाबेर ऐसा कर सके तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी। अगर वह ऐसा करते भी हैं, तो भी तेल कंपनियों को अपने वादों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना जरूरी है। अन्य बड़े उद्योगों की तरह, उन्होंने साबित कर दिया है कि वे उन उत्पादों की बिक्री जारी रखेंगे जिनके बारे में उन्हें पता है कि वे नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगातार पढ़ें व्याख्या करने वाला फॉसिल फ़्यूल क्या है कॉप 28 और दक्षिण एशिया के लिए इसके क्या मायने हैं? व्याख्या करने वाला आपदा क्या है लॉस एंड डैमेज और दक्षिण एशिया के लिए इसके क्या मायने हैं? व्याख्या करने वाला जलवायु शमन कार्बन बाज़ार क्या है? जलवायु परिवर्तन से निपटने में क्या है इसकी भूमिका? व्याख्या करने वाला आपदा क्लाइमेट चेंज ग्लॉसरी: जलवायु परिवर्तन से जुड़े ज़रूरी शब्दों का मतलब आलेख जलवायु प्रभाव एक शोध में हिमालय के मज़बूत गद्दी चरवाहा समुदाय पर प्रकाश डाला गया है आलेख एक्टिविज़्म सलीम उल हक नहीं रहे, दुनिया ने खोया क्लाइमेट जस्टिस का मसीहा आलेख पानी की गुणवत्ता कश्मीर की ऑक्सीजन विहीन झीलों में दम तोड़ती मछलियां आलेख जल प्रदूषण कितनी कामयाब हुई नमामि गंगे?