<p>ट्रांस सेक्स वर्कर लीना* ग्राहकों का इंतज़ार करती हैं (Image: <a href="https://www.instagram.com/gorkeypatwal">Gorkey Patwal</a>)</p>
जलवायु

हिजड़ा महिलाओं के लिए बढ़ती गर्मी बढ़ा देती है और भी खतरे

पहले से ही रोजगार, घर, और स्वास्थ्य सुविधाओं के हाशिए पर रहने वाले पारंपरिक ट्रांस और इंटरसेक्स समुदाय के लिए गर्मी एक के बाद एक कई मुश्किलें ला सकती है।
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गर्मी के तपते दिन में दिल्ली के एक ट्रैफिक सिग्नल पर दोपहर के तीन बज रहे हैं।

हर बार जैसे ही बत्ती लाल होती है, 27 साल की फ़िज़ा* सड़क के बीचोबीच चलकर जाती हैं। वह हिजड़ा-समुदाय की खास लय से ताली बजाती हैं और गाड़ी वाले यात्रियों को पैसे के बदले आशीर्वाद देती हैं। जब बत्ती हरी हो जाती है, तब वह सड़क के किनारे एक सूखी-सी, बेतरतीब झाड़ी के पास वापस लौट आती हैं। इस इलाके में कहीं छाँव नहीं है, ना ही पीने का पानी है और न ही बैठने की कोई जगह। 

वह कहती हैं, “अगर हम बाहर ज़्यादा देर तक खड़े रहेंगे तो बेहोश हो जाएँगे।”

वह अपनी साड़ी का भारी कढ़ाई वाला पल्लू ठीक करती हैं, और उसके चाँदी-से धागे दोपहर की धूप में चमक उठते हैं। 

“भीख माँगना भी एक अभिनय है,” वह कहती हैं, “लोग मानते हैं कि हममें दुआ देने की ताक़त है, इसलिए हमारा रूप मायने रखता है। हमें वैसा ही दिखना पड़ता है। लोगों का ध्यान खींचने के लिए साड़ी का चमकना ज़रूरी है।”

हिजड़ा दक्षिण एशिया का एक विशेष समुदाय है जिसमें ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स लोग आते हैं, और जो लंबे समय से चली आ रही परंपरा के अनुसार लोगों को जीवन की नई शुरुआतों, ख़ासकर जन्म और शादियों में आशीर्वाद देते हैं। पीढ़ियों से ट्रैफिक चौराहों पर भीख माँगना भारत में उनका आमदनी के सबसे दिखाई देने वाले ज़रियों में से एक रहा है, क्योंकि समुदाय के सदस्य औपचारिक रोज़गार से अभी भी वंचित हैं। 

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जैसे ही बत्तियाँ लाल होती हैं, फ़िज़ा की 22 साल की साथी मोहिनी* ट्रैफिक में जाती हैं, और वाहन चालकों को पैसे के बदले दुआएँ देती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)
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हिजड़ा महिलाएँ भीख मांगने को अभिनय की तरह देखती हैं, वैसे ही जैसे कुछ हिजड़ा महिलाएँ शादियों और अन्य त्योहारों में करती हैं। वो रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहनकर और बारीकी से बाल सजाकर उस भूमिका में ढल जाती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपे गए केरल डेवलपमेंट सोसाइटी के 2017 के एक सर्वेक्षण ने पाया कि जिन 900 ट्रांस लोगों से बात की गई उनमें से 92% “किसी भी तरह की आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार से बुरी तरह वंचित” थे। लगभग 96% ने कहा कि उन्हें रोजगार देने से मना कर दिया गया या काम मिलने के कुछ ही समय बाद उन्हें कलंक के कारण काम छोड़ना पड़ा। अधिकतर रोजगार और कमाई के अवसरों न मिलने ने उन्हें सेक्स वर्क और भीख मांगने में धकेल दिया है।

हिजड़ा महिलाओं को काम के चलते अक्सर घंटों खुले में मौसम की मार झेलनी पड़ती है। जैसे-जैसे गर्मियाँ लंबी और गर्म होती जा रही हैं, और सूखे महीने भी गर्म हो रहे हैं, उनका काम दूभर होता जा रहा है। इस साल, सामान्य से कम बारिश और लंबे समय तक भीषण गर्मी का संबंध एल नीनो से रहा है। अमेरिका के ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी में कम्प्यूटेशनल अर्थ सिस्टम वैज्ञानिक मोतासिम अशफाक कहते हैं, “जब एल नीनो के कारण मानसून में देरी होती है, या बारिश अनियमित और कम होती है, तब उससे भीषण गर्मी से मिलने वाली राहत भी कमज़ोर पड़ जाती है या टल जाती है। अगर बारिश में कमी बरकरार रहती है, तो सूखी और भीषण गर्मी भी बनी रह सकती है।” 

डायलॉग अर्थ ने दिल्ली, जालंधर, लुधियाना और चेन्नई की 26 हिजड़ा महिलाओं से बात की और जाना कि बढ़ती गर्मी का सीधा असर उनकी जीविका, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

जो ट्रांस महिलाएँ पहले से ही रोजगार, घर और स्वास्थ्य सुविधाओं के हाशिए पर हैं, उनके लिए गर्मी के प्रभाव एक के बाद एक कई मुश्किलें ला सकते हैं। गर्मी उनके बाहर काम करने की क्षमता घटाती है, कुछ को और भी जोखिम भरे कामों की ओर धकेल देती है; हार्मोन थेरेपी और जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी जैसी मेडिकल प्रक्रियाओं को सहने और उनसे ठीक होने को और मुश्किल बना देती है, और ख़राब वेंटिलेशन वाले घरों में रहने वालों के लिए भीषण तापमान में राहत की गुंजाइश नहीं छोड़ती।

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पेड़ की छाँव में आराम करती फ़िज़ा। धूप में कई घंटे काम करने के बाद उनके चेहरे का पीला होना हीट एग्जॉशन (गर्मी से थकावट) की निशानी है। (तस्वीर: गोरके पटवाल)
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उनकी साड़ी मोटे, सिंथेटिक कपड़े से बनी है जिसमें गर्मी झेलना और मुश्किल हो जाता है। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

हिजड़ा महिलाओं के भारी और सजे-धजे पहनावे गर्मी झेलना और मुश्किल बना देते हैं। 

ऊँचे तापमान के कारण दिन के ख़त्म होने तक अक्सर फ़िज़ा को तेज सिरदर्द होते हैं, चक्कर आते हैं, और कभी-कभार दस्त भी होते हैं। वह कहती हैं, “किसी-किसी दिन मेरा ब्लड प्रेशर कम हो जाता है और मुझे लगता है मैं गिर जाऊँगी। पर अगर मैं [ट्रैफिक] सिग्नल पर खड़ी नहीं रहूँगी, तो कमाई नहीं होगी।” विशेषज्ञों ने डायलॉग अर्थ को बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ़ रोज़ी-रोटी को ही नहीं, बल्कि ट्रांस महिलाओं के जीवन के अंतरंग, सामाजिक और आर्थिक बदलावों को भी प्रभावित कर रहा है।

खतरनाक समझौता

23 साल की सेक्स वर्कर लीना* कहती हैं, “मैं कभी भी इसे अपना फुल-टाइम काम नहीं बनाना चाहती थी।” फ़िज़ा की तरह वह भी, ट्रैफिक लाइट पर दुआएँ देने का काम करती थीं। पर बढ़ती गर्मी ने उन्हें हर रोज़ चौराहा पहले ही छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिसका असर उनकी कमाई पर पड़ा। पिछले दो सालों से, लीना फुल-टाइम सेक्स वर्क करती हैं, और वह अपनी ज़्यादातर कमाई रात के वक्त क्रूज़िंग स्पॉट (पिकअप प्वॉइंट) पर मिलने वाले अनजान ग्राहकों से करती हैं।

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लीना* पिछले दो सालों से फुल-टाइम सेक्स वर्क कर रही हैं। वह कहती हैं कि ग्राहक मिलना मुश्किल नहीं है। “कुछ मर्द इसलिए आते हैं कि उन्हें ट्रांस-महिलाओं के प्रति खास आकर्षण (फ़ेटिश) होता है। दूसरे इसलिए आते हैं क्योंकि ‘असली औरतें’ ज़्यादा चार्ज करती हैं।” (तस्वीर: गोरके पटवाल)

रात के 11 बज चुके हैं, और लीना एक फ्लाइओवर के नीचे खड़ी हैं। राजधानी की दिन भर की भीड़ की जगह अब गिनी-चुनी गाड़ियाँ हैं, और मर्द हैं जो ज़रूरत से ज़्यादा मंडरा रहे हैं। उन्हें पता है, किन निगाहों की तरफ़ देखना है और किन्हें अनदेखा करना है।

ये रातें अनिश्चित और अक्सर हिंसा से भरी होती हैं, पर इनसे लीना दिन की झुलसाने वाली गर्मी से बच जाती हैं। “हाँ ये बिल्कुल रिस्की है,” वह कहती हैं, “हम अनजान मर्दों से मिल रहे हैं, पर मर्द तो रिस्की ही होते हैं, है न?”

अपने फ़ोन पर वह फोटो गैलरी में स्क्रॉल करती हैं और अपनी एक तस्वीर पर रुक जाती हैं, उनके कपड़े ख़ून से सने हैं। उनके ऊपरी होंठ से लेकर जाँघों के जोड़ तक एक गहरा घाव है। “मैं लगभग बेहोश थी,” कहते हुए वह अपने चेहरे के उस हल्के निशान पर हाथ फिराती हैं, जो फाउंडेशन की जमी परत के नीचे से भी दिखाई दे रहा है। “मेरी ट्रांस बहनों ने मुझे ढूंढा और अस्पताल ले गईं।”

“आपको पता नहीं होता कि किसी ग्राहक के दिमाग़ में क्या चल रहा है। कभी वो हमें होटल सिर्फ़ सेक्स के लिए नहीं ले जाते, पीटने के लिए भी ले जाते हैं,” वह कहती हैं।

 “शायद उन्हें लगता है हमारे साथ यह करना आसान है क्योंकि हम ट्रांस हैं।”

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एक क्रूज़िंग स्पॉट पर अकेले काम करना हमेशा जोखिम भरा होता है। लीना कहती हैं कि जब कोई गड़बड़ होती है तो इलाके की उनकी ट्रांस बहनें ही मदद के लिए आती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

भारत में सेक्स वर्क की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है। हालांकि सेक्स सेवाएँ बेचना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहक तलाशना, कोठा चलाना और सेक्स वर्क की कमाई पर जीना अपराध की श्रेणी में आता है। यह स्थिति सेक्स वर्करों को वसूली और पुलिस उत्पीड़न के प्रति असुरक्षित बना देती है, और हिंसा का शिकार होने पर उन्हें बेहद सीमित सुरक्षा मिलती है।

इसके अलावा, भारत का बलात्कार कानून ट्रांसजेंडर सर्वाइवर्स के खिलाफ यौन हिंसा को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं देता, जिससे उनके पास कानूनी सुरक्षा कमजोर और न्याय के रास्ते सीमित रह जाते हैं। सेक्स वर्क से जुड़ी ट्रांस महिलाएँ एचआईवी और अन्य यौन संचारित रोगों (एसटीडी) के अत्यधिक और असमान जोखिम का सामना करती हैं।

अस्पतालों में कलंक, ग़लत जेंडर से संबोधित किए जाने, और भेदभाव की वजह से भी उन्हें समय पर स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिल पातीं, जिससे जरूरत होने पर भी एचआईवी जांच, इलाज और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच सीमित हो जाती है। कुछ हिजड़ा महिलाएँ ऐसी पहलों से जुड़ी हैं जो ट्रक ड्राइवरों और ट्रांस सेक्स वर्करों के साथ यौन संबंध रखने वाले अन्य समूहों तक एचआईवी जागरूकता और रोकथाम संबंधी जानकारी पहुँचाती हैं।

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भारत के कुछ शहरों में, सेक्स वर्क बड़े ट्रांसपोर्ट हब के आसपास केंद्रित होता है, जहाँ महिलाएँ ट्रक ड्राइवरों और राहगीरों जैसे ग्राहकों के संपर्क में आती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)
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ट्रांस सेक्स वर्कर रजनी* (सबसे दाएँ) ट्रक ड्राइवरों के लिए काम करने वाली परोपकारी संस्था से जुड़ी हुई हैं। अपने ख़ाली समय में वह घूम-घूम कर लोगों को यौन-स्वास्थ्य और सुरक्षित सेक्स व्यवहारों के बारे में समझाती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

गर्मी में ट्रांज़िशन

इस साल की शुरुआत में फ़िज़ा ने हार्मोन थेरेपी शुरू की। हालांकि ये उनके जीवन का अहम पड़ाव था, पर इसके बाद से उनके लिए गर्मी बर्दाश्त करना और भी मुश्किल हो गया है। 

“मुझे लगता है जब मैं हार्मोन वाली दवाइयाँ लेती हूँ, तो मुझे ज़्यादा गर्मी लगती है। औरत के तौर पर ‘हॉट’ नहीं, धूप वाली गर्मी,” वह हँसते हुए कहती हैं। जिन दिनों वह सरकारी फार्मेसी से दवा नहीं ले पातीं, उन दिनों उतनी तेज गर्मी नहीं लगती, वह बताती हैं।

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लीना रात के काम के लिए मेकअप लगाने से पहले अपने बाल पीछे बाँध रही हैं। फ़िज़ा की तरह अभी उनकी भी कोई सर्जरी नहीं हुई है पर वह अपना स्त्री रूप बनाए रखने के लिए हार्मोन थेरेपी की दवाईयां लेती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

हालांकि ट्रांस लोगों में गर्मी सहने की क्षमता पर शोध सीमित है, 2026 में कम्युनिकेशंस मेडिसिन में प्रकाशित एक शोध ने पाया कि हार्मोन थेरेपी लेने वाली ट्रांस महिलाएँ तापमान में बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। रियो डी जेनेरियो में हुए 2024 के एक एथनोग्राफ़िक अध्ययन के दौरान, तीन ट्रांस महिलाओं ने बार-बार बताया कि ट्रांज़िशन के बाद गर्मी को लेकर उनका अनुभव बदल गया। “मुझे ट्रांज़िशन से पहले के मुक़ाबले [अब] पसीना बहुत ज़्यादा आता है,” उनमें से एक के हवाले से दर्ज है। “ऐसा लगता है हार्मोन शरीर की गर्मी बढ़ा देते हैं।”

मोहिनी* फ़िज़ा के साथ काम करती हैं और 22 साल की हैं। पिछली गर्मी में उन्होंने जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी कराई थी, जिसमें सर्जनों ने उनके बाहरी स्त्री जननांग बनाए। सर्जरी से ठीक होने की प्रक्रिया ने उनके लिए गर्मी में काम करना और भी मुश्किल बना दिया है।

“मेरा शरीर अब पहले की तरह काम नहीं करता,” मोहिनी कहती हैं। “पहले मैं पूरे दिन काम कर लेती थी। अब ऐसा लगता है कि मैं अपनी आधी ताक़त में काम कर रही हूँ

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लीना अपने हैंडबैग में से ढूँढ कर अपनी पसंद के मेकअप ब्रांड्स की सस्ती नक़लें निकाल रही हैं। उन्होंने सोचा है कि एक दिन वह इन ब्रांड्स के असली महंगे प्रोडक्ट्स ख़रीदेंगी। (तस्वीर: गोरके पटवाल)
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लीना अपनी माँ के साथ पली-बढ़ीं, जो कभी ज़्यादा मेकअप नहीं करती थीं। उनकी दोस्त और रूममेट परी* ने ही उन्हें विंग्ड आईलाइनर लगाने के सलीके समेत मेकअप की बुनियादी बातें सिखाईं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

“[जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी से] ठीक होने की प्रक्रिया मरीज़ के ऑपरेशन थिएटर से निकलते ही खत्म नहीं होती,” ट्रांसजेंडर समुदायों के साथ काम करने वाली कंसलटेंट फिजिशियन चारु दत्त अरोड़ा कहती हैं। “बहुत से लोगों को अपनी शारीरिक क्षमता वापस पाने और शरीर के मेडिकल ट्रांज़िशन के बदलावों के अनुकूल ढलने में महीनों लग जाते हैं,” अरोड़ा बताती हैं। वह घर पर स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने वाली संस्था अमेरिहेल्थ की प्रमुख भी हैं। “जब रिकवरी का यह समय लंबे समय तक भीषण गर्मी के दौरान आता है, ख़ासकर उनके लिए जिनके पास बाहर काम करने के अलावा कोई चारा नहीं है, तो इससे शरीर पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है जो रिकवरी को बेहद मुश्किल बना सकता है।”

भारतीय कानून में एक बदलाव के कारण, गर्मी की मुश्किलों के बावजूद ट्रांज़िशन को मोहिनी और फ़िज़ा एक ऐसे फैसले के रूप में नहीं देखतीं जिसे टाला जा सके।

मई में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम का ताज़ा संशोधन लागू हो गया। इसने स्व-पहचान के पिछले प्रावधान की जगह जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी को पुरुष या महिला के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त करने का आधार बना दिया। इसके चलते ट्रांस व्यक्तियों के लिए पुलिस द्वारा पूछताछ का जोखिम और बढ़ गया है।

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काम के लिए तैयार होने का मतलब सिर्फ़ मेकअप करना नहीं है। दोनों महिलाएँ दिन के अधिकतर समय सोती हैं ताकि वे अपने सबसे बेहतर रूप में दिख सकें, और रात भर काम कर सकने की ताक़त बची रहे। (तस्वीर: गोरके पटवाल)
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लीना के जीवन में परी की भूमिका भी मेकअप से कहीं बढ़कर है। जब वह सेक्स वर्क शुरू कर रही थीं, तब परी ने अपना क्रूजिंग स्पॉट और अपने कुछ क्लाइंट्स भी उनसे साझा किए, और लीना को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

“मुझे पता नहीं कि सर्जरी के बिना मैं अपने पुराने रूप में ज़िंदा रह पाती या नहीं,” मोहिनी कहती हैं, “आख़िरकार अब मैं ख़ुद को पूरा महसूस करती हूँ। [लेकिन] असल में मेरे पास चारा ही क्या था?”

फ़िज़ा कहती हैं कि गर्मी “तो मैं जैसे-तैसे झेल ही लूँगी। पर मैं इस डर के साथ नहीं जीना चाहती कि कोई भी यह सवाल उठाए कि क्या मैं सच में औरत हूँ।”

स्वास्थ्य से बढ़कर सुरक्षा

पिछले महीने, फ़िज़ा के घराने – समुदाय की पारंपरिक गुरु-शिष्य नातेदारी व्यवस्था – की एक हिजड़ा महिला शहर के सबसे व्यस्त बाज़ारों में से एक में खरीदारों को दुआएँ दे रही थीं, तभी एक राहगीर ने उन्हें ₹500 का नोट थमा दिया। कुछ ही पलों बाद, कई पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोक लिया और उस व्यक्ति को पैसे देने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया।

“वह उन्हें सीसीटीवी फुटेज चेक करने को कहती रहीं,” फ़िज़ा कहती हैं, “पर वो सुन ही नहीं रहे थे।” फ़िज़ा के अनुसार, पुलिसवाले उस महिला को पुलिस थाने ले गए, जेंडर की पुष्टि करने के लिए उन्हें निर्वस्त्र किया, और जब उन्होंने पाया कि उस महिला ने सर्जरी नहीं कराई है, तो उन पर महिला बनने का नाटक कर जबरदस्ती उगाही करने का आरोप लगाते हुए उन्हें रात भर पीटा। उन्हें अगली सुबह छोड़ा गया।

“ऐसा हमारे साथ हमेशा होता है,” फ़िज़ा कहती हैं। “जब उन्हें पता चलता है कि आपने सर्जरी नहीं कराई है तो परिणाम बहुत बुरे होते हैं। उन्हें लगता है वो आपके साथ कुछ भी कर सकते हैं। पर अगर आपने सर्जरी कराई है तो वो अक्सर कुछ पैसे लेकर छोड़ देते हैं।”

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हिजड़ा महिलाओं के लिए पुलिस की हिंसा नई नहीं है, पर हाल में ट्रांस व्यक्तियों की कानूनी स्थिति में हुए बदलावों ने उन्हें और जोखिम में डाल दिया है। “जब उन्हें पता चलता है कि आपने सर्जरी नहीं कराई है तो परिणाम बहुत बुरे होते हैं,” फ़िज़ा कहती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

ट्रांसजेंडर अधिकारों के मामलों पर काम करने वाले वकील हर्षित आनंद कहते हैं कि संशोधित कानून पुलिस को राह चलते पहचान प्रमाण-पत्र मांगने का अधिकार नहीं देता। न ही ये बिना पहचान प्रमाण -पत्र के ट्रांसजेंडर होने या सर्जरी नहीं कराने को अपराध मानता है। पर मेडिकल ट्रांज़िशन को कानूनी पहचान से जोड़ कर, ये संशोधन ज़मीनी स्तर पर ट्रांस व्यक्तियों की पहचान के सत्यापन के तरीक़े को मूल रूप से बदल देता है, वह नोट करते हैं।

“पहले ट्रांसजेंडर पहचान की बुनियाद स्व-पहचान थी। अब राज्य का प्रमाणन ही आपकी पहचान का अंतिम और सबसे बड़ा सबूत बन चुका है,” आनंद कहते हैं। “यह संदेह की व्यवस्था खड़ी करता है। जहाँ कानून साफ़ तौर पर पहचान प्रमाण-पत्र नहीं माँगता, वहाँ भी उसका न होना निगरानी, उत्पीड़न और पुलिस की अनुचित दख़लंदाज़ी का बहाना बन सकता है।”

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फ़िज़ा पुलिस का सामना करने से बेहतर भीषण गर्मी को झेलना मानती हैं। “अब जब कानून बदल गया है, तब मैं अपना मेडिकल ट्रांज़िशन और टालना नहीं चाहती,” वह कहती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

फ़िज़ा के लिए, उनकी घराना-बहन के साथ पुलिस के बर्ताव की भयावह घटना ने उनके ट्रांज़िशन के फ़ैसले को बेहद ज़रूरी बना दिया है।

पिछले महीने, उन्होंने जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी से पहले होने वाली अनिवार्य मनोवैज्ञानिक जाँच के लिए रजिस्ट्रेशन किया। “मैं जानती हूँ सर्जरी इस भीषण गर्मी में मेरी ज़िंदगी मुश्किल कर देगी,” वह कहती हैं। “पर इसके बिना जीना उससे भी अधिक खतरनाक लगता है।”

सिलिकॉन, फाउंडेशन और गर्मी

“हर बीतती गर्मी के साथ, मुझे लगता है कि मैं उस औरत से दूर होती जा रही हूँ जो बनने के लिए मैं इतनी कड़ी जद्दोजहद कर रही हूँ,” 26 साल की डॉल कहती हैं।

चक्कर आने या थकान से ज़्यादा, उन्हें इस बात की चिंता सताती है कि धूप में घंटों बिताने से उनके रूप-रंग पर क्या असर पड़ रहा है। 

उनके अनुसार, धूप से उनका रंग गहरा हो गया है और अब उनका फाउंडेशन उनकी त्वचा के रंग से मेल नहीं खाता। वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि मैं हर दिन अपनी खूबसूरती खोती जा रही हूँ।”

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बहुत-सी हिजड़ा महिलाओं के लिए सुंदर दिखना विभिन्न पहलुओं से जुड़ा एक जटिल विषय है, जो उनकी रोज़ी-रोटी के साथ-साथ उनके वजूद की पहचान के लिए भी ज़रूरी है। लीना कहती हैं, “कभी-कभी मुझे लगता है कि यह खूबसूरती बड़ी आसानी से एक अभिशाप बन सकती है।” (तस्वीर: गोरके पटवाल)

मनोवैज्ञानिक और अधिकार-आधारित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अहमद फ़ज़ारिया का कहना है कि सिसजेंडर आबादी की तुलना में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों में शरीर से जुड़े तनाव (बॉडी-डिस्ट्रेस) का स्तर अधिक देखा जाता है। वह आगे कहते हैं, “जब किसी ने अपनी जेंडर पहचान स्थापित करने के लिए इतना संघर्ष किया हो, तो कोई बदलाव जो उन्हें अपने रूप से दूर ले जाता महसूस कराए, बेहद तकलीफ़देह हो सकता है, भले ही वह गर्मी जैसे पर्यावरणीय कारणों से ही क्यों न हो।”

डायलॉग अर्थ से बात करने वाली कई ट्रांस महिलाओं ने अपनी “ड्रीम बॉडी” (मनचाहा शरीर) पाने को अपने जीवन का गहरा और अहम पड़ाव बताया।

फ़ज़ारिया कहते हैं, “इन अनुभवों को केवल ‘बॉडी इमेज’ से जुड़ी चिंता मान लेना सही नहीं है। ये लैंगिक बेचैनी (जेंडर डिस्फोरिया), अल्पसंख्यक तनाव, सामाजिक डिस्फ़ोरिया और व्यवस्थागत गैर-बराबरी के मेल से पैदा होते हैं; इन्हें ट्रांस व्यक्तियों के शरीर का आंतरिक स्वभाव मानने के बजाय निरंतर होने वाले सामाजिक भेदभाव के नतीजों के तौर पर समझा जाना चाहिए।”

वह आगे कहते हैं कि बार-बार होने वाला हाशियाकरण यह तय कर सकता है कि ट्रांस व्यक्ति अपने शरीर को कैसे अनुभव करते हैं और उसमें कैसे जीते हैं। “इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ट्रांसजेंडर लोग अपने रूप-रंग को पसंद करते हैं या नापसंद, बल्कि यह है कि क्या वे अपने शरीर में गरिमा और स्वीकृति के साथ जी पा रहे हैं।”

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अपना मेकअप करने के बाद, लीना अपने फ़ोन कैमरे में ख़ुद को देखती हैं। अपना रूप संवारना उन्हें उस रात का सामना करने का हौसला देता है, जो अन्यथा डरावनी लग सकती है। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

घर और अपनापन

लीना के लिए ट्रैफिक सिग्नल छोड़ना और सेक्स वर्क अपनाने का मतलब अपने घराने को छोड़ना भी था। घराना उनकी मासिक कमाई के एक तय हिस्से के बदले यह तय करता है कि वे कहाँ भीख माँग सकती हैं।

उनके साथ रहने वाली उनकी गुरु, जो हिंदू हैं और एक प्रभुत्वशाली जाति से आती हैं, सेक्स वर्क को अपमानजनक मानकर इसका विरोध करती थीं। जब उन्हें पता चला कि लीना ने ग्राहकों से मिलना शुरू कर दिया है, तो उन्होंने लीना को घर से निकल जाने को कह दिया। 

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 लीना को उनके काम के विरोध के कारण घराना छोड़ने को कह दिया गया था। काफी मशक्कत के बाद, आखिरकार उन्हें किराए पर एक तंग कमरा मिला, जिसमें वह अपनी सबसे अच्छी दोस्त परी के साथ रहती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

घराना छोड़ने का मतलब शहर के सबसे भेदभाव भरे बाजारों में से एक में क़दम रखना भी था: किराए का घर ढूँढना। हालांकि लीना ₹8,000-9,000 महीने का किराया दे सकती थीं, ऐसा मकान मालिक ढूँढना मुश्किल था जो एक ट्रांस महिला को घर किराए पर दे। 

उनका अनुभव ट्रांस लोगों के खिलाफ व्यापक आवासीय भेदभाव के एक बड़े ढर्रे को दर्शाता है, जहाँ उन्हें अक्सर सीधे तौर पर किराए पर मकान देने से मना कर दिया जाता है, उनसे अधिक किराया वसूला जाता है या उन्हें पानी, स्वच्छता और वेंटिलेशन की अपर्याप्त सुविधाओं वाली घनी बस्तियों में रहने को मजबूर कर दिया जाता है। 

लीना अब दिल्ली के एक घनी आबादी वाले भीतरी इलाके में अपनी सबसे अच्छी दोस्त परी* के साथ एक छोटे से कमरे में रहती हैं। किराए का यह कमरा एक संकरी गली में खुलता है और दिन ढलने के काफी बाद तक भी दिन की गर्मी को क़ैद किए रहता है। 

“कई बार यह कमरा बाहर से भी अधिक गर्म लगता है,” परी कहती हैं, वह भी एक ट्रांस महिला हैं। किचन और बेडरूम एक ही कमरे में होने के कारण खाना बनाने से यह कमरा और भी दमघोंटू हो जाता है।

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मुश्किल हालात के बाद भी, लीना और परी एक परिवार की तरह रहती हैं। (तस्वीर: गोरके पटवाल)

उनका कहना है कि गर्मी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी घुस आती है। छोटी-मोटी असहमतियाँ तुरंत तकरार में बदल जाती हैं। फिर भी, एक-दूसरे को छोड़ने का सवाल पैदा नहीं होता। 

“वह मेरी सबसे करीबी दोस्त है। अगर हम एक दूसरे का साथ नहीं देंगे, तो कौन देगा?” परी कहती हैं। “हमारे वापस जाने के लिए परिवार नहीं हैं, न ही हम ख़ुद बच्चे पैदा कर सकती हैं।”

*महिलाओं के नाम उनकी पहचान बचाने के लिए बदल दिए गए हैं।

यह स्टोरी पुलित्ज़र सेंटर के साथ पार्टनरशिप में की गई है।

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