उस दिन तापमान 48 डिग्री सेल्सियस था और तेज धूप अपेक्षिता वार्षणे पर लगातार पड़ रही थी। आठ साल पहले, पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र राज्य के अकोला शहर से रिपोर्टिंग करते समय पत्रकार अपेक्षिता को बहुत खराब महसूस हो रहा था। उन्हें सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई कि इतनी भीषण गर्मी के बावजूद सब कुछ सामान्य चल रहा था। खेतों में मज़दूर काम कर रहे थे, सड़क किनारे दुकानदार खाना बेच रहे थे और दूसरे लोग भी अपने रोज़मर्रा के काम में लगे हुए थे।
बाद में उन्हें समझ आया कि ऐसी गर्मी में लंबे समय तक शारीरिक मेहनत करने से हीटस्ट्रोक (लू लगना) का खतरा लगभग तय हो जाता है। 2024 में भारत के बड़े शहरों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि अत्यधिक गर्मी वाले सिर्फ़ एक दिन में ही रोज़ होने वाली मौतों की संख्या लगभग 12% बढ़ जाती है। अगर हीटवेव (लंबे समय तक चलने वाली भीषण गर्मी) लगातार पाँच दिन तक रहे, तो यह बढ़ोतरी 33% तक पहुँच जाती है।
गर्मी और स्वास्थ्य के बारे में अधिक जानकारी के लिए डायलॉग अर्थ पढ़ें।
भारत में भीषण गर्मी से होने वाले आर्थिक नुकसान का अच्छी तरह रिकॉर्ड रखा जाता है। लैंसेट काउंटडाउन के अनुसार, 2024 में अत्यधिक गर्मी की वजह से भारत में लगभग 247 अरब श्रम घंटे बर्बाद हुए। इससे लोगों की संभावित आय में करीब 194 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ। लेकिन गर्मी से होने वाली मौतों और लंबे समय तक गर्मी झेलने से होने वाले स्वास्थ्य प्रभावों का उतना व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, जैसा अपेक्षिता वर्षणे ने पाया।
जब उन्हें एहसास हुआ कि भारत में गर्मी से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या शायद दर्ज नहीं हो रही है, तो उन्होंने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर ऐसे मामलों का डेटा इकट्ठा करना शुरू किया। 2022 में उन्होंने हीटवॉच नाम की एक पहल शुरू की, जो गर्मी के प्रति जागरूकता बढ़ाने, शोध करने और बेहतर नीतियों की वकालत करने पर काम करती है।
कचरा बीनने वाले लोगों, कपड़ा उद्योग के मज़दूरों जैसे संवेदनशील समुदायों पर अध्ययन करने और हीटस्ट्रोक (लू) के मामलों का डेटा जुटाने के ज़रिए यह गैर-लाभकारी संस्था लोगों में जागरूकता बढ़ाने, संस्थाओं की क्षमता मजबूत करने और जवाबदेही तय करने का काम करती है। इससे बेहतर फैसले लेने और ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाने में मदद मिलती है। वार्षणे का काम यह भी दिखाता है कि भीषण गर्मी का लोगों के जीवन पर कितना व्यापक और कई स्तरों पर असर पड़ता है।
वार्षणे कहती हैं, “हमें सिर्फ़ गर्मी से होने वाली मौतों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें यह भी देखना होगा कि गर्मी से लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है। इसका लोगों के दिल की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ता है? उनकी किडनी पर इसका क्या असर होता है?”
डायलॉग अर्थ ने वार्षणे से भारत में गर्मी से जुड़े कई अहम सवालों पर बात की। बातचीत में यह भी शामिल था कि सबसे ज़्यादा जोखिम किन लोगों को है, लंबे समय तक गर्मी झेलने के क्या असर होते हैं और इन समस्याओं को कम करने के लिए और क्या किया जा सकता है। स्पष्टता और संक्षिप्तता के लिए इस बातचीत को संपादित किया गया है।
डायलॉग अर्थ: भारत के सरकारी रिकॉर्ड गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या पर एकमत क्यों नहीं हैं? इसकी वजह क्या है?
अपेक्षिता वार्षणे: गर्मी एक ऐसी आपदा है, जिसका असर धीरे-धीरे दिखाई देता है। यह तूफान जैसी नहीं होती, जो तुरंत सबका ध्यान खींच ले। इसलिए हमें तुरंत समझ नहीं आता कि गर्मी लोगों की सेहत के साथ-साथ कामकाज, कारोबार और पूरी अर्थव्यवस्था को भी कितना नुकसान पहुँचा रही है।
इसी वजह से आज भी कई लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि गर्मी जानलेवा हो सकती है। हमारा स्वास्थ्य तंत्र अभी धीरे-धीरे इस स्थिति के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो रहा है कि भीषण गर्मी का शरीर पर क्या असर पड़ता है। इस विषय पर शोध भी अभी लगातार आगे बढ़ रहा है।
डॉक्टरों, नीति-निर्माताओं और सरकारी अधिकारियों के बीच अभी भी इस बात को लेकर काफी भ्रम है कि किस मौत को हीटस्ट्रोक (लू) से हुई मौत माना जाए। क्या वह व्यक्ति पहले से किसी बीमारी से पीड़ित था, जिसकी हालत गर्मी की वजह से और बिगड़ गई? या वह पूरी तरह स्वस्थ था, लेकिन अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से उसकी मौत हुई? इन दोनों स्थितियों में फर्क करना अक्सर आसान नहीं होता।
ज़मीनी स्तर पर डॉक्टर अक्सर कहते हैं कि उनके पास इतना समय या संसाधन नहीं होते कि वे पूरी जाँच या पोस्टमार्टम करके यह तय कर सकें कि मौत की वजह हीटस्ट्रोक (लू) थी या नहीं। जिन राज्यों में हीटवेव (भीषण गर्मी) को आधिकारिक तौर पर आपदा घोषित किया गया है, वहाँ मृतकों के परिवारों को मुआवज़ा देने का सवाल भी जुड़ जाता है। इससे मामला और जटिल हो जाता है। यही वजह है कि हीटस्ट्रोक का मुद्दा एक राजनीतिक चुनौती भी बन गया है।
लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है—लोग भीषण गर्मी की वजह से अपनी जान गंवा रहे हैं।
इसके सबूत लगातार बढ़ रहे हैं और इस पर पहले से ज़्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का भी कहना है कि गर्मी से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि गर्मी से होने वाली मौतों को समझने और दर्ज करने के लिए ज़्यादा ईमानदार और पारदर्शी तरीका अपनाया जाए।
सरकार की अलग-अलग एजेंसियाँ अलग-अलग तरीकों से आँकड़े जुटा रही हैं। इसके लिए कोई एक समान और मानकीकृत व्यवस्था नहीं है। दिशा-निर्देश तो हैं, लेकिन उनका पालन हर जगह एक जैसा नहीं होता। इंटीग्रेटेड हेल्थ इन्फॉर्मेशन प्लेटफ़ॉर्म जैसे पोर्टल भी हैं, जहाँ यह डेटा अपलोड किया जाना चाहिए। लेकिन ये आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए बाहरी लोग यह नहीं देख सकते कि क्या जानकारी दर्ज की जा रही है और वह कितनी सही है।
इसके अलावा, कई बार इस संकट की गंभीरता को कम करके भी देखा जाता है। लोग अक्सर कहते हैं कि भारत तो हमेशा से गर्म देश रहा है। ऐसी सोच की वजह से यह समझना मुश्किल हो जाता है कि अब गर्मी की स्थिति पहले से कहीं ज़्यादा गंभीर और खतरनाक होती जा रही है।
हीटवॉच शुरू करने के बाद, क्या आपको भारत में गर्मी से जुड़ी किसी ऐसी व्यक्ति या समुदाय की कहानी मिली, जिसने आपको हैरान या झकझोर दिया हो?
ऐसे कई उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि यह समस्या कितनी बड़ी है। एक कहानी जो मेरे मन में हमेशा रह गई, वह मोंगाबे की एक रिपोर्ट थी, जिसमें 54 वर्षीय सुरक्षा गार्ड देवी प्रसाद अहिरवार के बारे में बताया गया था। वे एक वंचित जाति से आते हैं और दिल्ली के बाहर काम करते समय उन्हें गंभीर हीटस्ट्रोक (लू) लग गया। छह दिन तक वेंटिलेटर पर बेहोश रहने के बाद वे बच तो गए, लेकिन उनका शरीर इतना कमजोर हो गया कि वे बिस्तर से उठ नहीं पाए। कोई आय या नियोक्ता की मदद न मिलने के कारण अहिरवार और उनका परिवार आर्थिक संकट में फँस गया।
यह कहानी कुछ आसान लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बातें सामने लाती है: हम चाहते हैं कि लोग गर्मी से बच सकें और हमारा स्वास्थ्य तंत्र इतना सक्षम हो कि हीटस्ट्रोक से पीड़ित लोगों को तुरंत जीवन बचाने वाली मदद मिल सके। लेकिन हम यह पर्याप्त रूप से नहीं सोच रहे हैं कि इसके बाद ठीक होने की प्रक्रिया कैसी होगी। भीषण गर्मी का शरीर पर बहुत गंभीर असर पड़ सकता है।
क्या आपको लगता है कि खबरों में जाति, वर्ग और काम की परिस्थितियों को अब भी कम महत्व दिया जाता है?
पिछले कुछ वर्षों में इस विषय पर रिपोर्टिंग निश्चित रूप से बढ़ी है, खासकर कमजोर समुदायों पर गर्मी के असर को लेकर, और यह अच्छी बात है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
गर्मी के संपर्क में आने और जाति व पेशे के बीच संबंध को लेकर पर्याप्त शोध या रिपोर्टिंग नहीं हुई है। हमें इस बात को भी मजबूती से सामने रखना चाहिए कि जो समुदाय कार्बन उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देते हैं, वही जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं। इसी तरह, जब जेंडर मुद्दों की बात आती है, तो हम अक्सर महिलाओं को एक ही समूह मान लेते हैं, जबकि उनके भीतर भी अलग-अलग स्तर की कमजोरियाँ होती हैं। उदाहरण के लिए, दलित महिलाएँ उच्च जाति की महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित होती हैं।
मज़दूरों के मामले में, बातचीत का ज़्यादातर ध्यान हीट एक्शन प्लान (गर्मी से बचाव की योजनाओं) पर चला गया है, लेकिन ये योजनाएँ काम करने की परिस्थितियों को सही मायने में संबोधित नहीं करतीं। इनमें बाहर काम करने वाले मज़दूरों के लिए ऐसे सुरक्षा उपायों की बात नहीं होती जिन्हें कानूनी रूप से लागू किया जा सके, और न ही काम के नुकसान से होने वाली आय की भरपाई के बारे में स्पष्ट व्यवस्था होती है।
अभी भी हम पानी, साफ-सफाई और छाया जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब बातचीत को आगे बढ़ाकर स्वास्थ्य सेवाओं, मुआवज़े और मज़दूरों की व्यापक सुरक्षा तक ले जाने की ज़रूरत है।
हीटवॉच के एक अध्ययन में पाया गया कि कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मज़दूरों के लिए घर के अंदर की गर्मी भी रोज़ की समस्या है। कई मज़दूरों ने बताया कि उनके काम करने की जगहों पर हवा का प्रवाह बहुत कम होता है और वेंटिलेशन (हवा आने-जाने की व्यवस्था) की कमी होती है। क्या आप इस तरह की गर्मी से होने वाले खतरों के बारे में और बता सकते हैं?
Iघर के अंदर की गर्मी (इंडोर हीट) खासकर अनौपचारिक बस्तियों और छोटी फैक्ट्रियों में एक बड़ी समस्या है। इनमें से कई जगहें टिन और एस्बेस्टस जैसी सामग्रियों से बनी होती हैं, जो गर्मी को अंदर रोक लेती हैं। वहाँ हवा का आवागमन कम होता है, जगहें बहुत भीड़भाड़ वाली होती हैं और छोटे-छोटे स्थानों में कई लोग रहते या काम करते हैं, जिससे गर्मी और बढ़ जाती है।
इन जगहों पर तापमान और नमी (ह्यूमिडिटी) को मापने वाले अध्ययनों से पता चला है कि यहाँ का तापमान बाहर के मुकाबले काफी अधिक हो सकता है।
फैक्ट्रियों में ठंडक की व्यवस्था बहुत सीमित हो सकती है—कई जगहों पर सिर्फ़ एक एग्जॉस्ट फैन या दूर लगे कुछ पंखे होते हैं। कुछ कामों की प्रकृति ऐसी होती है कि वहाँ कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता। इन सभी कारणों से अंदर काम करने वाले लोगों को भी उतनी ही गंभीर गर्मी का सामना करना पड़ सकता है, जितनी सीधे धूप में काम करने वालों को होती है।
लोग इससे बचने के लिए छोटे-छोटे तरीके अपनाते हैं। जैसे थोड़ी हवा पाने के लिए दरवाज़ों के पास बैठना, बच्चों को ऐसे पड़ोसियों के घर भेज देना जहाँ कूलर या एयर कंडीशनर की सुविधा हो, या बहुत ज़्यादा परेशानी होने के बावजूद काम करते रहना।
इस समस्या के समाधान आसान नहीं हैं। इसके लिए बेहतर निर्माण सामग्री का इस्तेमाल, इमारतों का बेहतर डिज़ाइन, कर्ज़ की सुविधा और ज़मीन के अधिकार व घर खाली करवाए जाने के डर जैसी समस्याओं को हल करना ज़रूरी है। इन बुनियादी समस्याओं को दूर किए बिना लोगों को गर्मी से वास्तविक और लंबे समय तक राहत देना मुश्किल है।
ऐसा लगता है कि हर गुजरते साल के साथ हीट स्ट्रेस बढ़ता जा रहा है। इस साल मार्च से अब तक केवल महाराष्ट्र में ही कथित तौर पर हीटस्ट्रोक के 163 मामले और तीन संदिग्ध मौतें दर्ज की गई हैं। इसके अलावा, गर्मी से जुड़े लक्षणों के कारण 4 लाख से अधिक लोग अस्पताल भी गए हैं। अगर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है, तो अगले दस वर्षों में भारत की गर्मियाँ कैसी दिखाई देंगी?
हम पहले से ही उन जगहों पर बदलाव देख रहे हैं, जहाँ पहले हीटवेव (लंबे समय तक चलने वाली भीषण गर्मी) नहीं आती थी। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में हाल के वर्षों में गर्मियाँ बहुत अधिक तेज़ रही हैं।
आने वाले समय में हीटवेव वाले दिनों की संख्या और अत्यधिक तापमान दोनों बढ़ने की संभावना है। अगर हम अपने शहरों की बनावट और उनके प्रबंधन के तरीके में बड़े बदलाव नहीं करते हैं, तो ये शहर धीरे-धीरे रहने के लिए और मुश्किल होते जाएंगे। केवल वही लोग कुछ सामान्य जीवन बनाए रख पाएंगे, जो कूलिंग (ठंडक की सुविधाओं) का खर्च उठा सकते हैं।
यह एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है कि ठंडक की सुविधाओं तक किसकी पहुँच है और किसकी नहीं। साथ ही, यह भी सोचने की ज़रूरत है कि कूलिंग को सिर्फ़ पैसे वालों के लिए उपलब्ध सुविधा मानना चाहिए या इसे एक ज़रूरी आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए।
अगर आप भारत में अगले हीटवेव (भीषण गर्मी) के मौसम से पहले सिर्फ़ एक बदलाव लागू कर सकते, तो वह क्या होता?
इस समस्या का कोई आसान समाधान नहीं है, क्योंकि यह बहुत जटिल है। लेकिन एक महत्वपूर्ण कदम यह हो सकता है कि हीटवेव को केवल राज्य स्तर की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा के रूप में घोषित किया जाए। इससे राष्ट्रीय स्तर पर धन उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। यह धन सिर्फ़ हीटवेव आने के बाद राहत कार्यों के लिए नहीं, बल्कि गर्मी के प्रभाव को कम करने की पहले से तैयारी और उपायों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। अभी हम अक्सर समस्या आने के बाद प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि ज़रूरत इस बात की है कि अत्यधिक गर्मी की स्थिति बनने से पहले ही योजना और निवेश किया जाए।
इसके साथ-साथ बड़े स्तर पर क्षमता निर्माण की भी ज़रूरत है। यह सिर्फ़ समुदायों की बात नहीं है, जिन्हें अक्सर गैर-लाभकारी संस्थाएँ मदद पाने वाले लोगों के रूप में देखती हैं। असल ज़रूरत यह है कि सरकारी अधिकारियों और नीति-निर्माताओं को इस समस्या की गंभीरता समझने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए और उन्हें सही साधन उपलब्ध कराए जाएँ। उन्हें यह जानकारी होनी चाहिए कि अत्यधिक गर्मी और जलवायु परिवर्तन देश पर क्या असर डाल रहे हैं और इससे निपटने के लिए कौन-कौन से समाधान उपलब्ध हैं।
और समाधान मौजूद हैं। लेकिन जब तक निर्णय लेने वाले लोग उन्हें समझेंगे नहीं और अपने-अपने क्षेत्रों में उन पर काम करने की क्षमता नहीं रखेंगे, तब तक वास्तविक बदलाव लाना बहुत मुश्किल होगा। ये कदम पहले ही उठाए जाने चाहिए थे, लेकिन अब इन्हें जल्द से जल्द लागू करने की ज़रूरत है।

