200 करोड़ साल से भी ज़्यादा पुरानी अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत में फैली हुई है। यह राजस्थान के गर्म और सूखे इलाके के बीच एक हरे-भरे मरुद्यान जैसी लगती है। इसकी लहरदार पहाड़ियाँ, जैव-विविधता से भरे जंगल और जल स्रोत मिलकर एक बड़ी हरी दीवार बनाते हैं, जो राज्य के पश्चिमी किनारे पर फैले थार मरुस्थल की गर्मी और धूल से देश के बाकी हिस्सों को बचाती है।
इसके पर्यावरण के लिए इतने महत्व के बावजूद, व्यवसायिक खनन से अरावली को लगातार नुकसान हो रहा है। 2018 और 2023 के बीच अरावली के जिलो में अवैध खनन के कम से कम 29,209 मामले दर्ज किए गए थे।
शहरों के फैलाव से बढ़ा खनन का दबाव इस इलाके के भू-दृश्य को बदल रहा है। अरावली रेंज से कम से कम 65 खनिजों का खनन होता है, जिनमें जिंक और कॉपर के अलावा शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में प्रयुक्त होने वाले औद्योगिक खनिज जैसे संगमरमर, क्वार्ट्ज़, चूना पत्थर, और ग्रेनाइट भी शामिल हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ता कैलाश मीना ने अपने गाँव नीम का थाना में इस खनन का असर खुद देखा है। उनके पिता एक चरवाहे थे और उनकी आजीविका पशुपालन और छोटी खेती पर निर्भर थी। लेकिन गाँव में संगमरमर के खनन के कारण अब इनसे गुज़ारा करना मुश्किल हो गया है।
खनन और विस्फोट से इलाके में भूजल का स्तर नीचे जा रहा है। इससे पुरानी चट्टानों को भी नुकसान हो सकता है, जो बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने में मदद करती हैं। खनन से उठने वाली धूल और भारी वाहनों की वजह से फसलों पर धूल जम जाती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब होती है और पानी व हवा भी प्रदूषित होते हैं, मीना ने डायलॉग अर्थ को बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि जिन चरागाहों और वन उत्पादों पर गाँव के कई घरों की आजीविका निर्भर थी, वे धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं।
मीना कहते हैं, “अरावली इलाके के जिन गाँवों में ज्यादा खनन हुआ है, वहाँ पशुओं की संख्या बहुत कम हो गई है, जिससे लोगों की पारंपरिक आजीविका पर बुरा असर पड़ा है।” जो लोग अब भी खेती कर रहे हैं, उनकी कमाई भी कम हो गई है।
“हमारे जैसे गांव खनन माफिया से पीड़ित हैं,” मीना डायलॉग अर्थ को बताते हैं। “दिल्ली जैसे क्षेत्रों में होने वाले बहुत से कंस्ट्रक्शन हमारे छोटे पर्यावरण-संवेदनशील गांवों में हो रहे खनन से अपनी सामग्री से प्राप्त करते हैं।”
अरावली की पहाड़ियों और पूरी रेंज की परिभाषा बदलने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव ने स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों की चिंता और बढ़ा दी है।
सरकार की एक प्रेस रिलीज़ के अनुसार, “अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊंचाई स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे ज्यादा हो, उसे अरावली पहाड़ियां कहा जाएगा।” वहीं 500 मीटर के अंदर स्थित दो पहाड़ियों के बीच के 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली सभी भू-आकृतियों को अरावली रेंज माना गया है।
पर्यावरणविद और विशेषज्ञ कहते हैं कि ये परिभाषाएँ बेहद सीमित हैं और अरावली भू-दृश्य के बड़े हिस्से, ख़ासकर निचली झाड़ीदार पहाड़ियों के विस्तृत क्षेत्र को खतरे में डालती हैं। स्थानीय लोग चिंतित हैं कि इससे अरावली में और भी अधिक खनन का रास्ता खुल सकता है, वह भी इस बार कानूनी रूप से।
“ऐसी कमरों में बैठे लोग अरावली के जमीनी हालातों की जटिलताएँ नहीं समझ सकते। हमारी आवाज़ को भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।” शोधकर्ता कुसुम रावत कहती हैं जो अरावली में स्थित दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से हैं। वह जिले में सोने की नई खदान मिलने से और भी चिंतित हैं कि इससे पहाड़ियों में खनन और बढ़ जाएगा।
नई परिभाषाओं को नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दे दी थी, लेकिन लगातार आलोचना और विरोध के कारण कुछ ही हफ्तों बाद अदालत ने इस फैसले को रोक दिया। यह फैसला उस समय लिया गया जब केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में नए खनन पट्टों (लीज) पर रोक लगा दी थी।
उदाहरण के लिए, नीम का थाना के दो ग्रामीणों द्वारा जनवरी में दायर की गई सुप्रीम कोर्ट की याचिका के बाद राजस्थान सरकार ने कार्रवाई की।
अधिकारियों ने माना कि जिस जमीन को एक निजी कंपनी को खनन के लिए दिया गया था, वह अरावली क्षेत्र के अंदर आती है, और सभी काम रोकने का आदेश दिया गया।
पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसकी अनुमति के बिना खनन नहीं हो सकता, लेकिन इसके बावजूद खनन शुरू हो गया था। इसी वजह से ग्रामीणों ने याचिका दायर की।
समुदाय एक साथ आ रहे हैं
रावत उन कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और सामुदायिक नेताओं में हैं जिन्होंने हाल ही में 700 किलोमीटर की 38 दिवसीय अरावली संरक्षण यात्रा पूरी की है। यह यात्रा पर्वत रेंज के विस्तार वाले सभी राज्यों और क्षेत्रों – राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली से गुजरी।
इस यात्रा के दौरान सदस्यों ने कम से कम 1,000 ऐसे लोगों से मुलाक़ात की जो अरावली के आसपास रहने की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। खनन-जनित वायु प्रदूषण की चर्चा जहाँ आम थी, वहीं बहुत से लोगों ने फेफड़े की लाइलाज बीमारी सिलिकोसिस से पीड़ित होने की शिकायत की, जो कि खनन के दौरान हवा में मिलने वाली क्रिस्टलीय सिलिका धूल की अधिक मात्रा में साँस लेने से होती है। अब तक, राजस्थान राज्य द्वारा सिलिकोसिस के 25,000 से अधिक मामलों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें 1,100 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं।
इन आंकड़ों के बारे में टिप्पणी के लिए संपर्क करने पर राजस्थान राज्य सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया।
स्वतंत्र वन विश्लेषक कांची कोहली का कहना है कि खनन का सबसे बड़ा दबाव शहरों के फैलाव से आता है, क्योंकि अरावली के आसपास रियल एस्टेट और सड़कों के लिए कच्चा माल यहीं से लिया जाता है। उन्होंने सरकारों से अपील की है कि वे अपनी योजना बनाते समय अरावली जैसे महत्वपूर्ण इलाकों पर शहरीकरण के सामाजिक और पर्यावरणीय असर को ध्यान में रखें।
पूरे अरावली रेंज में लोग और संगठन सरकार की इस प्राचीन पर्वत तंत्र की नई परिभाषा के कारण और भी अधिक खनन के खतरे से लड़ रहे हैं।
मई 2025 में, नागरिकों के समूह पीपल फॉर अरावलीज़, जिसने यात्रा में अहम भूमिका निभाई थी, ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और हरियाणा सरकार को एक नागरिक रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि लाइसेंस प्राप्त खनन गतिविधियों ने चरखी दादरी और भिवानी जिलों में अरावली पर्वत श्रृंखला का बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया है। समूह की संस्थापक नीलम अहलूवालिया कहती हैं, “गुरुग्राम, नूंह और फरीदाबाद जिलों की अरावली पहाड़ियाँ उस समय बुरी तरह नुकसान में आ गई थीं, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन पर रोक लगाने से पहले यहाँ लाइसेंस के साथ खनन हो रहा था। लेकिन अब भी गैरकानूनी खनन खुलेआम जारी है।” वे आगे कहती हैं, “महेंद्रगढ़ जिले में, जहाँ कई इलाकों में भूजल स्तर 1,500 से 2,000 फीट तक नीचे चला गया है, वहाँ लाइसेंस्ड और अवैध खनन ने भारी नुकसान पहुँचाया है।”
“पूरी पर्वत रेंज लहूलुहान है,” वह कहती हैं।
मीणा के गांव जैसे समुदायों का ज़िक्र करते हुए अहलूवालिया कहती हैं, “ये लगभग बिना किसी कार्बन फुटप्रिंट वाले समुदाय हैं। फिर भी पर्यावरणीय तबाही के दुष्प्रभाव ये ही झेल रहे हैं।
मीणा इस बात पर जोर देते हैं कि लंबे समय से त्रस्त भारत के इस हिस्से पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता।“पिछले कुछ वर्षों में, उत्तर भारत में प्रदूषण और हीट वेव ने सुर्खियां बटोरीं। पर हमारे इलाक़ों में यही समस्याएं 30 सालों से हैं।” वह आगे कहते हैं कि उत्तरी क्षेत्र अरावली के बिना नीम का थाना की तरह ही “मुश्किल ही बच पाएंगे।”
अहलूवालिया नोट करती हैं कि अरावली यात्रा से कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र भर में बैठकों और जन सुनवाइयों के मध्यम से क्षेत्रीय आवाज़ों को संवाद में लाने की कोशिश की। वह कहती हैं, “अरावली पर अपनी जीविका के लिए निर्भर और उसकी गोद में बसे लोगों की राय जानना ऐसा कोई भी फैसला लेने से पहले बेहद ज़रूरी है, जिससे उनके जीवन, स्वास्थ्य और जीविका पर सीधा असर पड़े।”
समुदायों और पर्यावरणविदों द्वारा किए हस्तक्षेपों का असर दिख रहा है।
मीणा की याचिका के अलावा नीम का थाना के एक समूह द्वारा जनवरी में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका से राजस्थान राज्य सरकार हरकत में आई। अधिकारियों ने पाया कि एक प्राइवेट कंपनी को खनन के लिए दी गई ज़मीन अरावली रेंज में थी, और वहाँ सभी गतिविधियों पर रोक लगाने का आदेश दिया। कोर्ट की मंजूरी के बिना खनन पर रोक वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले के बाद भी वहाँ खनन गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं, जिसके कारण गांववालों ने याचिका दायर की।
मार्च में, खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने वानिकी और भूविज्ञान जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक समिति बनाई, ताकि अरावली की एक नई और समान परिभाषा तय की जा सके।
पर्यावरण पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली रेंज के पर्यावरणीय महत्व को लेकर कोई मतभेद नहीं है।
अहलूवालिया के अनुसार, 100 मीटर की नई परिभाषा से जंगल, वन्यजीव गलियारे और भूजल रिचार्ज जैसे जुड़े हुए महत्वपूर्ण क्षेत्र सुरक्षा से बाहर हो सकते हैं। वे कहती हैं, “इससे खनन को आसान और कानूनी बनाने का रास्ता खुल सकता है।”
सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट को दी गई भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट बताती है कि थार मरुस्थल के किनारे स्थित अरावली पहाड़ियाँ रेत को रोककर मरुस्थलीकरण के खिलाफ एक प्राकृतिक ढाल का काम करती हैं। वे तेज़ हवाओं को भी रोकती हैं और दिल्ली व आसपास के इलाकों को धूल भरी आंधियों से बचाती हैं।
के. परमेश्वर, जो अदालत की सहायता करने वाले विशेषज्ञ (एमिकस क्यूरी) हैं, ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस रिपोर्ट को पर्यावरण मंत्रालय ने दबा दिया था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, परमेश्वर ने यह भी बताया कि 100 मीटर वाली परिभाषा को कई अहम पक्षों, जैसे फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, का समर्थन नहीं मिला था। साथ ही, इस प्रस्तावित परिभाषा को कभी भी आम लोगों की राय के लिए सार्वजनिक रूप से पेश नहीं किया गया।
अरावली पहाड़ियों के नुक़सान से में कमी आने से वर्षा जल को ज़मीन में समाने की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी। कोहली के अनुसार, इससे भूजल रिचार्ज कम हो सकता है, जिसका असर खेती और पानी की उपलब्धता पर पड़ेगा और फसलों के पैटर्न भी बदल सकते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ये चिंताएँ अकारण डर फैलाने वाली हैं। दिसंबर 2025 में पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि इन नियमों के अनुसार अरावली भू-दृश्य का लगभग 90% हिस्सा सरंक्षित रहेगा और रेंज का सिर्फ़ 0.19% हिस्सा ही खनन के योग्य होगा। हालांकि, डाउन टू अर्थ का एक विश्लेषण नोट करता है कि इस परिभाषा के लागू होने पर अरावली का लगभग 49% हिस्सा खनन की चपेट में आ जाएगा।
डायलॉग अर्थ द्वारा संपर्क किए जाने के बाद, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक प्रतिनिधि ने जवाब दिया कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है (सब ज्यूडिस) और इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। हालांकि मंत्रालय की प्रेस रिलीज़ ने नोट किया कि अरावली रेंज की इसकी परिभाषा दो समीपवर्ती पहाड़ियों के बीच की 500 मीटर की ज़मीन को संरक्षित करती है, “इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली सभी भू-आकृतियों में खनन की अनुमति है।
अपनी रिपोर्ट में परमेश्वर ने नोट किया कि अगर दो 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से अधिक है, तो उनके बीच की ज़मीन सरंक्षित नहीं होगी।
लड़ाई जारी है
कुछ नागरिक समूह अरावली रेंज को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत पर सवाल उठा रहे हैं। अरावली बचाओ सिटिजन मूवमेंट की ज्योति राघवन कहती हैं कि यह भू-दृश्य पहले से ही पहचाना और समझा हुआ है। उनका सवाल है, “जब सब जानते हैं कि अरावली क्या है, तो इसकी परिभाषा बदलने की ज़रूरत क्यों है?”
नई खनन लीज़ पर रोक के बाद भी लोगों की चिंता कम नहीं हुई है, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर समस्याएँ बनी हुई हैं।
रावत कहती हैं, “साफ़ हवा और पानी हमारी बुनियादी ज़रूरत हैं। अगर हम पर्यावरण नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा? यह हमारी ज़िम्मेदारी है।”
गुरुग्राम के पास अरावली क्षेत्र में रहने वाली राघवन बताती हैं कि सालों में यहाँ की जैवविविधता घटती गई है। “जिन पक्षियों, सियारों और नीलगायों को मैं पहले देखती थी, वे अब धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं,” वे कहती हैं।
“मैं यह लड़ाई उन जीवों के लिए लड़ रही हूँ, जो अपनी आवाज़ खुद नहीं उठा सकते।”
मीणा जैसे लोगों के लिए यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन का सवाल है। “हम अपनी रोज़ी-रोटी और अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे खेत, मवेशी और पानी सब खतरे में हैं। आखिर हम किस कीमत पर इन पहाड़ियों का खनन कर रहे हैं?”
इस आर्टिकल को 16 अप्रैल 2026 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की प्रतिक्रिया शामिल करने के लिए अपडेट किया गया था। 21 अप्रैल 2026 को, एक स्रोत द्वारा किए गए अनुरोधों के मद्देनज़र इसे फिर से संपादित किया गया।

