भारत में इस साल गर्मियां जल्दी आ गई हैं, और साथ लेकर आई हैं हीटवेव का ख़ौफ़।
मार्च के पहले ही सप्ताह में दिल्ली का तापमान 35°C पार कर गया था, जो कि 2011 के बाद पहली बार हुआ है। मुंबई के मेट्रोपोलिटन क्षेत्र में तापमान के 40°C पहुँचने पर हीट चेतावनियां जारी की गईं।
आमतौर पर अदृश्य आपदा के रूप में जानी जाने वाली गर्मी भारत के शहरी इलाक़ों में रहने वाले लोगों का जीवन साफ़ तौर पर तेजी से प्रभावित कर रही है।
मुंबई जलवायु सप्ताह (मुंबई क्लाइमेट वीक) में डायलॉग अर्थ के पैनल के दौरान, हीट विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि सिर्फ़ मरने वाले लोगों की संख्या ही नहीं बढ़ रही है बल्कि भारत के तेजी से फैलते शहरों को आने वाली गर्मी से निपटने के लिए नहीं बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन शहरों में सबसे संवेदनशील लोगों को गंभीर रूप से और भी ध्यान और मदद की ज़रूरत है।
हीट आइलैंड
शहरों में ऐसे ऊँचे तापमान अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट से आते हैं, जिसके कारण उनका तापमान आसपास के गांवों से अधिक रहता है।
शहरों का तापमान अक्सर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा होता है। यह कई कारणों के एक साथ होने से होता है, जैसे शहरों में पेड़ कम होते हैं जो छाया या ठंडक दे सकें, कंक्रीट और ईंट की इमारतें अधिक होती हैं जो ज़्यादा गर्मी सोखती हैं और शहरों में ऊर्जा का इस्तेमाल भी अधिक होता है जिससे अतिरिक्त हीट भी पैदा होती है। इस प्रभाव को अर्बन हीट आइलैंड (यू एच आई) इफ़ेक्ट के रूप में जाना जाता है।
एक हालिया शोध के अनुसार देश के कई शहरों में हालात और बदतर होने वाले हैं। शहरी क्षेत्रों का औसत तापमान आसपास के गांवों की तुलना में 45% और बढ़ने वाला है।
इस गर्मी के स्वास्थ्य संबंधी जोखिम चिंताजनक हैं। 2000 और 2020 के बीच भारत मौसम विज्ञान विभाग ने गर्मी से जुड़ी 10,545 मौतें दर्ज की। इसी दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन पदाधिकरण (एनडीएमए) ने 17,767 और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 20,615 मौतें दर्ज कीं।
पर विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी से मरनेवालों की संख्या इससे काफ़ी अधिक हो सकती है। इन आंकड़ों में वे मौतें शामिल नहीं हैं जो गर्मी के कारण हृदय रोग, डायबिटीज, मानसिक रोग और अस्थमा जैसी समस्याओं के और बिगड़ जाने से होती हैं।
जलवायु परिवर्तन शोध संगठन सस्टेनेबल फ्यूचर्स कॉलेबोरेटिव में पर्यावरण प्रशासन और नीति समन्वयक भार्गव कृष्ण कहते हैं, “सरकारी आंकड़े स्वास्थ्य केंद्र में फिजिशियन द्वारा दर्ज की गई गर्मी-संबंधित बीमारियों जैसे हीट स्ट्रोक (लू लगना) या हीट एग्जॉशन (गर्मी से थकावट) तक ही सीमित हैं।
यह एक CATCH स्टोरी है
यह रिपोर्ट डायलॉग अर्थ की कम्युनिटी अडाप्टेशंस टू सिटी हीट (CATCH) परियोजना का हिस्सा है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस परियोजना को वेल्कम से वित्तीय सहायता मिली है। डायलॉग अर्थ की सभी सामग्री संपादकीय रूप से स्वतंत्र हैं।
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हीट ट्रैप में जीवन
पिछले 50-60 सालों में भारत में हीटवेव की घटनाओं की संख्या, अवधि और तीव्रता में बढ़ोतरी हुई है वहीं शहरी पलायन में भी तेजी आई है।
जनगणना के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, गावों से शहरी इलाकों में आने वाले प्रवासियों की संख्या 2001 में 5.16 करोड़ से बढ़कर 2011 में 7.82 करोड़ हो गई। शहरी झुग्गियों की आबादी भी 5.24 करोड़ से बढ़कर 6.55 करोड़ हो गई।
दिल्ली-स्थित थिंक-टैंक कॉउन्सिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट और वाटर की 2025 की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत के 57% जिले, जिनमें देश की तीन चौथाई आबादी रहती है, अब अत्यधिक गर्मी के उच्च से अति उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं। इस रिपोर्ट में जोखिम को “खतरा, संपर्क और संवेदनशीलता के एक साथ” मौजूद होने के रूप में परिभाषित किया गया है।
कृष्ण बताते हैं कि बढ़ती हीटवेव, तेज़ शहरी पलायन और खराब शहरी प्लानिंग की वजह से बेतरतीब बस्तियों का फैलाव मिलकर “हीट ट्रैप” यानी गर्मी के जाल बना रहे हैं।
कृष्ण आगे कहते हैं कि घर किन वस्तुओं से बना है उसी से तय होता है कि उसमे रहने वाला व्यक्ति गर्मी से कितना निपट सकता है। “आप भले ही किसी ढंकी जगह पर काम करते हों, लेकिन अगर वहाँ इंसुलेशन ख़राब है और उसके बाद आप एक ऐसे घर में लौटते हैं जो हीट को ट्रैप करने वाले मटेरियल से बना है और जहाँ वेंटिलेशन भी नहीं है, तो आप रात को भी ठीक नहीं हो पाते।”
असल में कोई अदृश्य नहीं होता, हम बस आँखें बंद कर लेते हैं।राशि मेहरा, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन सेटलमेंट्स
सतत शहरीकरण पर केंद्रित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन सेट्लमेंट्स में कंसलटेंट और भूगोलवेत्ता राशि महरा कहती हैं कि भीषण गर्मी की सबसे अधिक मार गरीब इलाकों पर ही पड़ती है।
मेहरा कहती हैं कि इतनी गर्मी झेल रही आबादी की गिनती भी ठीक से नहीं की जाती। “सरकारी आंकड़े कहते हैं कि दिल्ली की 11-15% आबादी बस्तियों में रहती है, पर असली संख्या 30% के करीब है।”
ये आबादी दिल्ली की बेहद छोटे भू-भाग में सघन रूप से भरी हुई है। बस्तियां दिल्ली की ज़मीन का सिर्फ 0.6% हिस्सा हैं जबकि सिर्फ कार पार्किंग ही शहर का 2% हिस्सा घेर लेती है। इन बस्तियों के अनौपचारिक होने के कारण, वे प्लानिंग में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर आधिकारिक आंकड़ों से गायब हैं।
इसका मतलब है कि जब शहर के नए मास्टर प्लान बनते हैं तब बस्ती में रहने वाले लोगों को निकाल दिया जाता है।
मेहरा सिर्फ बस्तियों ही नहीं बल्कि अवैध कॉलोनियों, पुनर्वास क्षेत्रों और अन्य अनौपचारिक रिहायशी और काम करने वाले इलाकों का भी ज़िक्र करते हुए कहती हैं, “अनौपचारिकता का मतलब है जो प्लानिंग और सरकारी आंकड़ों के दायरे से बाहर है, जिसमे असल में शहर का ज्यादातर हिस्सा शामिल है। जब हम गर्मी की बात करते हैं तो सबसे अधिक संवेदनशील वाले लोग उन आंकड़ों में होते ही नहीं”
वह कहती हैं, “कोई असल में अदृश्य नहीं होता, हम बस लोगों को जानबूझकर नहीं देखते।”
हीट एक्शन प्लान
कृष्ण कहते हैं कि अभी हाल तक ही गर्मी को अधिसूचित आपदा नहीं माना गया था। इस मान्यता से पीड़ितों और प्रभावित क्षेत्रों को सरकारी मुआवजा मिल सकता है।
इसके लिए कोई विशेष फंडिंग नहीं थी, राजनीतिक दबाव भी सीमित था और स्पष्ट संस्थागत जिम्मेदारियां भी नहीं थी। कृष्ण कहते हैं, “बहुत से मामलों में, स्वास्थ्य विभागों ने ही प्रतिक्रिया का नेतृत्व किया क्योंकि इनका असर उनपर ही सबसे अधिक पड़ता था।”
हालांकि हीटवेव को अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदा के रूप में मान्यता नहीं मिली है, पर इस मामले में प्रगति हो रही है। बीते दो सालों में, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और तेलंगाना ने हीटवेव को ऐसी आपदा मान लिया है जिसके लिए पीड़ित परिवारों को मुआवजा मिलेगा।
बीते दशक में भीषण गर्मी की प्राथमिक पालिसी प्रतिक्रिया हीट एक्शन प्लान (HAP) रहे हैं। ये प्लान यह तय करते हैं
कि हीटवेव की घोषणा के बाद शहर की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। इनमें पानी और ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट्स ( ओआरएस) उपलब्ध कराने से लेकर हीट स्ट्रेस से रोकथाम के लिए विज्ञापन जारी करना, और स्वास्थ्य कर्मचारियों, स्कूली बच्चों और स्थानीय समुदाय के लिए के लिए हीट रोकथाम प्रशिक्षण का आयोजन करना शामिल है।
वहीं रेड-अलर्ट स्तर की गर्मी के लिए, ये प्लान संवेदनशील आबादी और उच्च जोखिम वाले इलाकों की पहचान, और सार्वजनिक इलाकों जैसे बड़े बस टर्मिनलों में अतिरिक्त मेडिकल वैन और स्वास्थ्य टीमों की तैनाती की माँग करते हैं।
ऐसा पहला हीट एक्शन प्लान अहमदाबाद ने 2010 की हीटवेव के बाद शुरू किया। उस हीटवेव में अनुमान से 1300 से भी अधिक अतिरिक्त मौतें हुई थीं। अहमदाबाद के बाद और भी कई शहरों ने ऐसा ही किया।
पहले हीट एक्शन प्लान अक्सर काफी तकनीकी होते थे थे और उनमें कई पूर्व चेतावनियां, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल, और जनता के लिए एडवाइजरी भी शामिल होती थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्लान संवेदनशील वर्गों की पहचान तो करते थे, पर इनमें रोज़ गर्मी का सामना करने वालों स्ट्रीट-वेंडरों, कंस्ट्रक्शन वर्करों, कचरा उठाने वालों, और अन्य अनौपचारिक कामगारों के लिए उनकी स्थिति को ध्यान में रखने वाले उपाय नहीं थे।
कृष्ण कहते हैं कि 2025 में आ रहे नए हीट एक्शन प्लान सामुदायिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं जिनमें गर्मी की चपेट में आने वाले समूहों की राय भी शामिल की गई है।
उसी साल, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एडवाइजरी ने अनौपचारिक कामगारों की बेहतर पहचान के लिए साफ़ तौर पर जोर दिया। कुछ शहरों ने इसका पालन किया है। जैसे दिल्ली का 2025 हीट एक्शन प्लान यह ज़रूरी बनाता है कि अधिकारी अनौपचारिक बस्तियों में बिना किसी रुकावट के पानी की सप्लाई और छाँव वाले इलाकों और कूलिंग शेलटरों की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे।
नगरीय प्लानिंग की पुनर्कल्पना
भारत और दुनियाभर के विशेषज्ञ कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ने वाले तापमान और उससे उपजी गर्मी के अनुकूल होने के लिए शहरों की प्लानिंग और विकास के तरीकों के बारे में नए सिरे से सोचने की ज़रूरत है।
पर अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में अर्बन हीट की विशेषज्ञ पैट्रिशिया फेबियन का कहना है कि इसकी सबसे बड़ी चुनौतियों में एक यह है कि शहर गर्मी के आने के बाद उसके बारे में सोचते हैं।
वह कहती हैं, “अत्यधिक मुश्किल हालात में शहर इमरजेंसी मोड में चले जाते हैं – जैसे मौतों को रोकना, अस्पताल में भर्ती हो रहे लोगों की संख्या कम करना, पड़ोसियों का ध्यान रखना। ऐसे वक्त में लम्बे समय के लिए सोचना मुश्किल होता है।
पर दीर्घकालिक क्षमता का मतलब है कि लोग अपने घर, काम की जगह, और स्कूल में ठंडे रह सकते हैं जिससे शहरों को इमरजेंसी प्रतिक्रिया पर इतना अधिक निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
इसका अर्थ है निवासियों के लिए बुनियादी सेवाओं, और शहरी इलाक़ों को ठंडा रखने वाले हरित क्षेत्रों जैसे विकल्पों की बेहतर प्लानिंग। पेड़ लगाने और ठंडी सड़कें बनाने से भी मदद मिल सकती है, साथ ही घरों को बेहतर इंसुलेशन, कूलिंग उपकरणों और धूप को सोखने की जगह परावर्तित करने वाली सफेद छतों से बेहतर बनाया जा सकता है। फेबियन के अनुसार ऐसे उपायों पर और ध्यान देने की ज़रूरत है।
पर कृष्ण का मानना है कि जब शहरों में बुनियादी तालमेल में इतनी जद्दोजहद है तो डिस्ट्रिक्ट कूलिंग यानी केंद्रीय प्रणाली से पूरे इलाके को ठंडा रखने या बड़े-स्तर के व्यवस्थागत समाधान दूर की बात लगते हैं। वह कहते हैं, “बहुत से शहरों में हरी-भरी जगहों, प्लानिंग, ज़ोनिंग स्पष्टता और बुनियादी सुविधाओं की भी कमी है।”
योजनाकारों को सबसे संवेदनशील वर्गों जैसे धूप में काम करने वाले मजदूरों और बस्तियों में रहने वालों को भी बेहतर डेटा के माध्यम से नज़र में लाने और योजनाओं में शामिल करने की ज़रूरत है। मेहरा कहती हैं, “उन्हें सिर्फ बातचीत में जगह नहीं बल्कि बातचीत के केंद्र में होने की ज़रूरत है।”
इन जोखिमों के बारे में चर्चाओं का मतलब है संवेदनशील सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों से निपटना होगा। शोध से पता चलता है कि जातीय और धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक लोग विशिष्ट इलाकों में सघन रूप से बसे हुए हैं। मेहरा कहती हैं, “भारत में जाति जोखिम का एक बड़ा कारण है। प्लानिंग में जाति, धर्म और नस्ल नहीं देखने का विकल्प हमारे पास नहीं है।”
मेहरा और कृष्ण कहते हैं कि गर्मी के असर से बच पाने में सबसे कम सक्षम लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना बेहद ज़रूरी है।
कृष्ण कहते हैं, “गर्मी हमारे शरीर पर काफी निजी तौर पर महसूस होती है, पर हमें उस अनुभव को हमारे शहरों के व्यापक हालात से जोड़ना होगा।”
“गर्मी हमें एकजुट करती है, पर हमें यह भी पहचानना होगा कि 21वीं सदी में आपदाएं प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित होती हैं,” मेहरा कहती हैं.
