टीडी अचुथन पिछले महीने के आखिर में सुबह 11 बजे एक स्कूल में वोट डालने गए। 29 साल के अचुथन चेन्नई, तमिलनाडु के रहने वाले हैं। वह दिन में बाद में लगने वाली लंबी लाइनों और तेज गर्मी से बचना चाहते थे।
लेकिन जब वह वहाँ पहुँचे, तब तक कम से कम 60 लोग लाइन में खड़े थे। उनमें से सिर्फ एक-तिहाई लोग ही छायादार गलियारे में खड़े हो सकते थे।
अचुथन कहते हैं, “बाकी हम लोग खुले मैदान में खड़े थे, जहाँ पेड़ों की कोई छाया नहीं थी। वह बहुत थका देने वाला अनुभव था।”
संपादक का संदेश
इस श्रृंखला के पहले भाग में हमने देखा था कि जब तापमान बहुत बढ़ जाता है, तब चुनाव प्रचार करना कितना खतरनाक हो सकता है। कई लोगों का मानना है कि भारत अभी भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहा है। अब दूसरे भाग में हम देख रहे हैं कि मतदान वाले दिन क्या होता है।
इस महीने भारत के कई राज्यों में चुनाव पूरे हुए। चेन्नई में कुछ मतदाताओं के लिए गर्मी बहुत कठिन साबित हुई।
अचुथन को वोट डालने के लिए आखिरकार दो घंटे इंतज़ार करना पड़ा। इनमें से एक घंटा उन्होंने तेज धूप में खड़े होकर बिताया। वह कहते हैं, “यह बहुत ज्यादा थका देने वाला अनुभव था। घर वापस आकर मुझे कुछ घंटों तक सोना पड़ा ताकि मैं ठीक महसूस कर सकूँ। इसके बावजूद मुझे शरीर में पानी की कमी महसूस हो रही थी।”
जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान और स्वास्थ्य से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में चिंता बढ़ रही है कि तेज गर्मी लोगों की सेहत के साथ-साथ उनके वोट देने के अधिकार को भी प्रभावित कर रही है।
चेन्नई के एक मतदान केंद्र पर मौजूद अधिकारियों ने डायलॉग अर्थ को बताया कि सिर्फ उन जगहों पर टेंट लगाए गए थे जहाँ पाँच से ज्यादा मतदान बूथ थे।
मार्च से 25 जुलाई 2024 के बीच – जिसमें भारत के पिछले आम चुनावों का प्रचार और मतदान का समय शामिल था – भीषण गर्मी के कारण 370 से ज्यादा लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई। हालांकि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही मतदान के आखिरी दिन तेज गर्मी की वजह से कम से कम 33 चुनाव कर्मचारियों की मौत हो गई।
24 अप्रैल 2024 को भारत के सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पश्चिमी महाराष्ट्र में एक चुनावी रैली को संबोधित करते समय मंच पर बेहोश हो गए थे।
कुछ देर बाद ठीक होने पर उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि गर्मी की वजह से उन्हें “असहज महसूस” हो रहा था।
हालाँकि यह रैली शाम 4:30 बजे हुई थी, जब आमतौर पर दोपहर की सबसे ज्यादा गर्मी कम होने लगती है, फिर भी उस दिन उनके चुनाव प्रचार स्थल का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस था।
उस साल हुए आम चुनावों में 65.8% मतदान हुआ। यह 2019 के चुनावों की तुलना में थोड़ा कम था, जब 67.4% लोगों ने वोट डाला था। यह गिरावट छोटी जरूर थी, लेकिन काफी महत्वपूर्ण मानी गई।
भारत की राजधानी नई दिल्ली में पिछले दस सालों का सबसे कम मतदान दर्ज किया गया। वहीं केरल में 2024 का मतदान पिछले 25 वर्षों में सबसे कम रहा। केरल के मुख्य चुनाव अधिकारी संजय पॉल ने न्यूज़ मिनट को बताया कि कई मतदान केंद्रों पर दोपहर 3 बजे के बाद अचानक बड़ी संख्या में लोग पहुँचे। उनका मानना था कि तेज गर्मी की वजह से लोगों ने देर से वोट डालना चुना। रिपोर्ट में एक सहायक रिटर्निंग अधिकारी के हवाले से कहा गया कि सुबह लंबी लाइनों की वजह से कुछ लोग घर वापस चले गए और गर्मी से बचने के लिए फिर वोट डालने नहीं लौटे।
पिछले कुछ हफ्तों में हुए चुनावों को कई चीज़ों ने प्रभावित किया। लेकिन वोटिंग शुरू होने से पहले ही गर्मी चुनाव प्रचार को प्रभावित करने लगी थी।
जलवायु और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर काम करने वाली संस्था एनआरडीसी इंडिया में क्लाइमेट रेज़िलिएंस और हेल्थ विभाग का नेतृत्व करने वाले अभियांत तिवारी कहते हैं, “हमें तुरंत यह अध्ययन करना चाहिए कि गर्मी वोटिंग पर कैसे असर डालती है। गर्मियों में चुनाव करवाना आगे चलकर और ज्यादा मुश्किल होगा, और इसका बुरा असर मतदाताओं के साथ-साथ चुनाव से जुड़े हर व्यक्ति पर पड़ेगा।”
सबसे ज्यादा असर कमजोर लोगों पर
तेज गर्मी की वजह से थकान, सोचने-समझने की क्षमता में कमी और दिल पर दबाव जैसी समस्याएँ होती हैं। शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट” की वजह से तापमान और ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे कई कामगार कठिन शिफ्ट पूरी करने के बाद भी ठीक तरह से आराम नहीं कर पाते।
शहर अक्सर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा गर्म होते हैं। इसके पीछे कई कारण होते हैं। शहरों में आमतौर पर पेड़ कम होते हैं, इसलिए छाया और ठंडक भी कम मिलती है। वहाँ कंक्रीट और ईंटों की इमारतें ज्यादा होती हैं, जो गर्मी को सोख लेती हैं। इसके अलावा शहरों में ऊर्जा का इस्तेमाल भी ज्यादा होता है, जिससे अतिरिक्त गर्मी पैदा होती है। इन सभी कारणों से शहरों का तापमान आसपास के इलाकों से ज्यादा हो जाता है। इसी को “अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट” कहा जाता है।
गैर-लाभकारी संस्था हीटवॉच की संस्थापक अपेक्षिता वर्श्नेय कहती हैं, “जब तक चुनाव का दिन आता है, तब तक कई कामगारों का शरीर पहले से ही बहुत थका हुआ होता है। ऐसे में उन्हें घंटों तक तेज धूप में लंबी लाइन में खड़ा रहने के लिए कहना सचमुच उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।”
उन्हें डर है कि इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर लोगों पर पड़ेगा, और शायद इसी वजह से वे वोट डालने ही न जाएँ।
भारतीय चुनाव आयोग के एक अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताना चाहा, कहते हैं, “हम मानते हैं कि गर्मी लोगों को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।” उन्होंने बताया कि हर मतदान केंद्र पर कुछ “न्यूनतम जरूरी सुविधाएँ” उपलब्ध कराई जाती हैं, जिनमें पर्याप्त छाया भी शामिल है। साथ ही मतदान सुबह जल्दी शुरू किया जाता है और शाम 6 बजे तक चलता है, ताकि लोग सबसे ज्यादा गर्मी वाले समय से पहले या बाद में वोट डाल सकें।
पूरी दुनिया की समस्या
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से 2025 के बीच कम से कम 8 देशों में 10 चुनाव हीटवेव यानी भीषण गर्मी से प्रभावित हुए।
इन देशों में अमेरिका, मेक्सिको, स्पेन, फ्रांस, रोमानिया, भारत, मालदीव और फिलीपींस शामिल हैं।
मई 2025 में फिलीपींस के आम चुनावों के दौरान हीटवेव की वजह से तापमान खतरनाक स्तर तक पहुँच गया था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ मतदान केंद्रों पर तेज गर्मी के कारण वोटिंग मशीनें ठीक से काम नहीं कर रही थीं। इससे मतदान में देरी हुई और लोगों को और ज्यादा देर तक गर्मी में खड़ा रहना पड़ा।
वहीं मेक्सिको में 2024 के आम चुनावों से पहले देश के कुछ हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया था। इस भीषण गर्मी के कारण कई लोगों की मौत भी हुई।
अमेरिका में संघीय चुनाव नवंबर महीने में होते हैं। लेकिन वहाँ भी तेज गर्मी राजनीति के लिए परेशानी बन रही है। 2024 में एरिज़ोना में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक चुनावी रैली के दौरान, अंदर जाने के लिए लाइन में इंतज़ार कर रहे 11 लोगों को गर्मी से जुड़ी समस्याओं के कारण अस्पताल भेजना पड़ा था।
इसके अलावा, 24 जून 2025 को न्यूयॉर्क शहर के जॉन एफ कैनेडी एयरपोर्ट पर तापमान 102 फ़ारेनहाइट यानी 39 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। यह उस जगह पर जून महीने का अब तक का सबसे गर्म दिन था।
शहर के बुज़ुर्गों और लंबे समय से बीमार लोगों जैसे कमजोर वर्गों को घर के अंदर रहने की सलाह दी गई थी।
उसी दिन डेमोक्रेटिक पार्टी के मेयर पद के उम्मीदवार के लिए मतदान हो रहा था। माना जा रहा था कि जो उम्मीदवार जीतेगा, वही आगे चलकर शहर का मेयर बनेगा।
न्यूयॉर्क सिटी के चुनाव बोर्ड ने वादा किया था कि मतदान केंद्रों पर पंखे लगाए जाएँगे और पानी की व्यवस्था की जाएगी।
लेकिन डेमोक्रेटिक नेताओं ग्रेगरी मीक्स और रोडनीस बिशोट-हर्मेलिन ने प्राथमिक चुनाव से चार दिन पहले एक संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने कहा, “न्यूयॉर्क सिटी का चुनाव बोर्ड हीटवेव से निपटने के लिए तैयार नहीं है।”
इस मामले पर प्रतिक्रिया के लिए न्यूयॉर्क सिटी चुनाव बोर्ड से संपर्क किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
समाधान हैं
विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव के दिन लोगों को गर्मी से सुरक्षित रखने के लिए तीन चीजें सबसे ज़रूरी हैं — ऐसे मतदान समय तय करना जिससे लोग सबसे ज्यादा गर्मी वाले समय से बच सकें, भीड़ को इस तरह संभालना कि लोगों को धूप में लंबा इंतज़ार न करना पड़े, और मतदान केंद्रों पर ऐसी सुविधाएँ होना जो लोगों को गर्मी के असर से बचा सकें।
इसके लिए कूलर, पंखे और छायादार इंतज़ार वाली जगहें बनाई जा सकती हैं। साथ ही बुज़ुर्गों जैसे कमजोर लोगों के लिए अलग तेज़ लाइनें भी हो सकती हैं।
चेन्नई में कई मतदाताओं ने डायलॉग अर्थ को बताया कि बुज़ुर्ग और दिव्यांग लोगों के लिए बिना लाइन में लगे वोट डालने की व्यवस्था की गई थी।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में शाम 6 बजे मतदान खत्म करने की व्यवस्था बढ़ती गर्मी के दौर में लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रहेगी।
केरल के इंटीग्रेटेड रूरल टेक्नोलॉजी सेंटर के शोधकर्ता राजेश के कहते हैं, “पिछले मतदान के पैटर्न से साफ है कि सबसे ज्यादा भीड़ सुबह 10 बजे से पहले और दोपहर 3 बजे के बाद होती है। गर्मी की स्थिति को देखते हुए मतदान का समय बदलना समझदारी होगी। लोगों को शाम 6 बजे की बजाय रात 9 बजे तक वोट डालने की अनुमति मिलनी चाहिए।”
एक और बड़ा विकल्प यह हो सकता है कि चुनाव कराने का समय ही बदल दिया जाए ताकि भीषण गर्मी से बचा जा सके।
भारत में आम चुनाव अक्सर अप्रैल, मई और जून जैसे गर्म महीनों में होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल अक्सर मई या जून की शुरुआत में खत्म होता है, इसलिए चुनाव उससे पहले करवाए जाते हैं।
जून से सितंबर तक का मानसून का समय चुनाव और प्रचार के लिए टाला जाता है, क्योंकि भारी बारिश से मतदान प्रभावित हो सकता है और कई इलाकों तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है।
भारत का चुनाव आयोग कहता है कि चुनाव के समय में ऐसा बदलाव करने का अधिकार उनके पास नहीं है।
भारतीय चुनाव आयोग के एक अधिकारी कहते हैं, “हमारे पास इन तारीखों में आसानी से बदलाव करने की सुविधा नहीं है। किसी भी बदलाव के लिए ऊँचे स्तर पर फैसला लेना होगा।”
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एस. कृष्णमूर्ति का कहना है कि इसके लिए संसद में इस मुद्दे को उठाना पड़ सकता है और नया कानून भी बनाना पड़ सकता है।
हालाँकि सर्दियों में चुनाव करवाने से अपनी अलग चुनौतियाँ भी सामने आएँगी। उदाहरण के लिए, चुनाव ड्यूटी में बड़ी संख्या में शिक्षक लगाए जाते हैं, और उस समय उनकी उपलब्धता एक समस्या बन सकती है।
लेकिन जैसे-जैसे हीटवेव की संख्या, तीव्रता और अवधि बढ़ रही है, वैसे-वैसे गर्मियों में चुनाव करवाना लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा माना जाने लगा है।
कृष्णमूर्ति कहते हैं, “दस साल पहले तक गर्मी को मतदान पर असर डालने वाला बड़ा कारण नहीं माना जाता था। लेकिन अब हम इसके असर को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।”
वह चाहते हैं कि राजनीतिक दल इस समस्या पर गंभीरता से बात करें और चुनाव आयोग भी इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उठाए।वह कहते हैं, “चुनाव जनवरी से अप्रैल के बीच करवाए जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए सभी राजनीतिक दलों की सहमति और कानून में बदलाव जरूरी होगा।”
जब तक बदलती दुनिया के हिसाब से चुनाव की पुरानी समय-सारिणी बदलने पर बहस जारी है, तब तक लोगों को सुरक्षित रखने के लिए जल्दी कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे कदम, जो यह मानें कि भीषण गर्मी अब एक बड़ा खतरा बन चुकी है और यह सुनिश्चित करें कि हर व्यक्ति सुरक्षित तरीके से वोट डाल सके।
अपेक्षिता वर्श्नेय कहती हैं, “हमारे पास पहले से ही सुरक्षा कारणों या प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में चुनाव टालने के नियम मौजूद हैं। अब कई राज्यों में भीषण गर्मी को आधिकारिक रूप से आपदा घोषित किया जा चुका है, इसलिए इसे भी उसी आधार पर माना जाना चाहिए।”
यह आर्टिकल द ज़ायलम और डायलॉग अर्थ के सहयोग से तैयार किया गया है।
