जलवायु भीषण गर्मी में लोकतंत्र: गर्म होती जलवायु में चुनाव भीषण गर्मी में चुनाव प्रचार खतरनाक है, पर कई कहते हैं कि भारत समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहा है हिन्दी हिन्दी English Share this article × Copy link to page Copy link to page × पुन: प्रकाशन अगर आप हमारी प्रकाशन नीति की शर्तों या सामग्री का उपयोग करने की अनुमति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो [email protected]पर हमें संपर्क करें। तमिलनाडु के सलेम में एक चुनावी रैली में हज़ारों समर्थक शामिल हुए। इस रैली में एक नई पार्टी ने राज्य के विधान सभा चुनाव के लिए प्रचार की शुरुआत की। (फोटो: इमेजो / अलामी) प्रियंका तिरुमूर्ति, निगाज़ ए. आई. अप्रैल 24, 2026May 22, 2026 13 फ़रवरी को 37 साल के सूरज तमिलनाडु के सलेम के एक खुले मैदान में चार घंटे तक खड़े रहे। वह अभिनय से राजनीति में आए एक नेता का चुनावी भाषण सुनने का इंतज़ार कर रहे थे। दोपहर की शुरुआत तक गर्मी बेहद बढ़ गई थी। भाषण शुरू हुए कुछ मिनट ही हुए थे, कि सूरज अपनी छाती पकड़े हुए गिर पड़े। एक घंटे से भी कम समय के अंदर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। गिरने से पहले के कुछ घंटों में, सूरज 38C से ऊपर के सार्वभौमिक ताप जलवायु सूचकांक या यूनिवर्सल थर्मल क्लाइमेट इंडेक्स (यूटीसीआई) की चपेट में आए थे, ऐसा तमिलनाडु की एक पर्यावरण संस्था पूवुलगीन ननबर्गल (पृथ्वी के मित्र) का एक अध्ययन कहता है। यूटीसीआई “महसूस होने वाले” तापमान की गणना करता है जो आस पास की हवा के तापमान के अलावा उमस, हवा के प्रवाह और धूप को भी ध्यान में रखता है। इस सूचकांक के 32C से ऊपर जाने का अर्थ है गंभीर ताप जनित तनाव या हीट स्ट्रेस, वहीं इसके 38C से अधिक जाने से अत्यधिक गंभीर या भीषण हीट स्ट्रेस होता है जिसमें जरा सी भी सक्रियता खतरनाक हो सकती है। जब शरीर का आंतरिक तापमान 39C या उससे अधिक हो जाता है, तो इससे डिहाइड्रेशन हो सकता है, अंग काम करना बंद कर सकते हैं और मौत भी हो सकती है। सूरज की मौत एक ऐसी हक़ीक़त से रूबरू कराती है जिसे बड़े तौर पर अनदेखा किया गया है। देश में चुनाव और भी अधिक खतरनाक गर्मी में हो रहे हैं। इसके कारण हो रही मौतों के बाद भी इस परिस्थिति को जन स्वास्थ्य के लिए खतरे की तरह नहीं देखा जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण हीट वेव्स की स्थिति और भी ख़राब होने की आशंका है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल संसाधनों और कमजोर वर्गों पर और भी दुष्प्रभाव और खतरे होंगे। मतदान के लिए बड़ा महीना इस महीने 9 अप्रैल से 29 अप्रैल के बीच तमिल नाडु, केरल, असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में क्षेत्रीय चुनाव हुए। चुनाव के पहले के दिनों में, केरल भर में तापमान बढ़ रहा था और पारा 38C तक पहुँच गया था। भारत मौसम विभाग ने अप्रैल में कई उन तारीखों के लिए हीटवेव चेतावनियां जारी की हैं जब मतदान भी हो रहे थे। विभाग ने केरल के 14 में से 12 जिलों में येलो अलर्ट जारी किया है। धरातल पर ऐसी चेतावनियों ने चुनावी अभियानों का रूप बदल दिया है। कई राज्यों में पार्टियों ने अपने कार्यक्रम में परिवर्तन किए, डॉक्टरों ने गर्मी-संबंधित बीमारियों में बढ़ोतरी की तैयारी की और कार्यकर्ताओं ने बाहर काम करने की बढ़ती मुश्किलों का वर्णन किया। कोझिकोड जिले में प्रचार अब जल्दी सुबह और शाम तक सिमट गया है।“अगर हम सुबह 11:30 बजे के बाद बाहर रहते हैं तो लोगों को चकत्ते और थकान होने लगती है”, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सिस्ट) के कार्यकर्ता जयेश एम कहते हैं। रैलियों में बदलावों के बावजूद इन सभाओं के दौरान गर्मी-संबंधित बीमारियों में भारी उछाल आता है. असम के गुवाहाटी में डॉक्टर कल्पना महंता कहती हैं, “जब भी कोई बड़ी सभा होती है, हर बार चक्कर आने, साँस फूलने और डिहाइड्रेशन के केस आते हैं”। यह घटनाएँ 2024 आम चुनाव की याद दिलाते हैं, जो देश की सबसे तीव्र हीटवेव की घटनाओं के दौरान हुआ था। दसियों हज़ारों की संख्या में हीट स्ट्रोक के संदिग्ध मामले दर्ज किए गए थे, साथ ही सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी। इन मौतों के अनुमान 360 से 700 तक जाते हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों को भी काफ़ी मुश्किलें हुईं। विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके से 2024 में चुनाव लड़ने वाले सिंघाई रामचंद्रन याद करते हैं, “लगातार पानी पीते रहने के बाद भी, मेरे लिए तालमेल बिठाना मुश्किल था।” उन्हें बेहोश होते उम्मीदवार, खतरनाक सनबर्न और डिहाइड्रेशन से अस्पताल में भर्ती होने के मामले याद हैं।“अब हम शाम को रैलियां करते हैं,” सत्ताधारी पार्टी डीएमके के प्रवक्ता ए. सरवनन कहते हैं, “पर भीड़ कम होती है और उसमे ज्यादातर समर्पित पार्टी कैडर होते हैं। आम जनता गर्मी से दूर रहती है।” संधारणीयता और जलवायु मुद्दों पर काम कर रही संस्था स्विचऑन फाउंडेशन की अदिति कुंडू भी कहती हैं कि गर्मी में मतदाता राजनीतिक आयोजनों में जाने से और भी कतरा रहे हैं। “पिछले कुछ चुनावों में, पार्टियां अपने समर्थकों को रैलियों के दौरान नारियल पानी दे रही हैं। हमने उन्हें धूप से बचने के लिए हैट और छाता देते भी देखा है। पर सिर्फ़ ये चीज़ें ऊँचे…तापमान से निपटने के लिए काफ़ी नहीं हैं।” पश्चिम बंगाल में उनका शोध दर्शाता है कि गर्मी अब सिर्फ़ कभी-कभार होने वाली रुकावट नहीं बल्कि लगातार मौजूद संकट हैं। शोध में शामिल 61.7% उत्तरदाताओं का कहना था कि उनकी जान-पहचान में किसी न किसी की गर्मी से मौत हुई है। फिर भी कुछ राजनेता इसके चुनावों पर असर को नकारते हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के उपाध्यक्ष जयप्रकाश मजूमदार कहते हैं,”यहाँ लोगों की गर्मी की आदत हो गई है।” वह जोड़ते हैं, “मतदान प्रतिशत राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है, जलवायु पर नहीं।” फ़रवरी 2014 में कर्नाटक के मंगलौर में एक चुनावी रैली। स्टेज को ठीक से देख पाने के लिए लोग कुर्सियों पर खड़े हैं। (फोटो: रेनर क्रैक / अलामी) कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि यह नज़रिया एक गहरी समस्या उजागर करता है: भारत में गर्मी के स्वास्थ्य पर असर अक्सर अनदेखे रहते हैं और दर्ज नहीं होते हैं इसलिए वे अस्वीकृत रहते हैं। गर्मी के चरम पर पहुँचने से पहले ही फ़रवरी में सूरज की मृत्यु, इस पैटर्न में फिट बैठती है: इसे आधिकारिक तौर पर दिल का दौरा माना गया था जिससे गर्मी की संभावित भूमिका छिप गई। हीटवॉच की संस्थापक अपेक्षिता वर्षणेय कहती हैं, “जिसे आप गिन नहीं सकते, उसपर आप कुछ कर नहीं सकते। जब आधिकारिक आंकड़े कहते हैं कि एक सीजन में सिर्फ़ कुछ दर्जन लोग ही गर्मी से मरे हैं, तब नीति-निर्माता अपनी निष्क्रियता को उचित ठहरा सकते हैं।” असली संख्या कई गुना अधिक हो सकती है, वह कहती हैं। हालांकि कुछ मौतें गर्मी से हुई मौतों के रूप में दर्ज होती हैं। द ज़ाइलम और डायलॉग अर्थ ने 2024 और 2025 में संदिग्ध रूप से गर्मी से हुई 20 मौतों का विश्लेषण किया, जिन्हें हीटवॉच ने केरल, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल की मीडिया रिपोर्टों से दर्ज किया था। ये मौतें फ़रवरी से जुलाई के बीच हुई, जब आमतौर पर देश के चुनावों के प्रचार और मतदान होते हैं। इनमे से 17 मौतें तब हुई थीं जब यूटीसीआई 38C के पार चला गया था। बाक़ी तीन मौतों के दौरान यूटीसीआई 32C से अधिक था और उनमे अत्यधिक संवेदनशील बुजुर्ग या भारी शारीरिक श्रम करने वाले लोग शामिल थे। जहाँ गर्मी की खतरनाक परिस्थितियाँ भी थीं, वहाँ भी अक्सर हीटवेव की सूचना नहीं दी गई थी: जिन 13 जगहों में मौते हुईं उनमें से सिर्फ़ पाँच में ही अलर्ट जारी किए गए थे। 2024 में अधिकतर मौतें अप्रैल और मई में हुईं। 2025 में काफ़ी मौतें जुलाई जैसे बाद के महीने में भी हुईं, ख़ासकर असम में जहाँ उमस के कारण लंबे समय तक हीट स्ट्रेस रहा। विभिन्न राज्यों में, फ़रवरी-जुलाई की चुनावी अवधि में यूटीसीआई स्तर ज्यादातर खतरे के निशान से ऊपर रहे। मार्गदर्शन की कमी हीट चेतावनी तंत्रों और कूलिंग साधनों के बिना खुले में चुनाव कराना स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। पर आधिकारिक तौर पर निगरानी और मार्गदर्शन का अभाव झलकता है। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने द ज़ाइलम और डायलॉग अर्थ से इस बात की पुष्टि की कि आयोग मतदाताओं, मतदान कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मचारियों की गर्मी से जुड़ी बीमारियों और मौतों का कोई आंकड़ा नहीं रखता है। 2024 की मीडिया रिपोर्टों ने इस बात का ज़िक्र किया कि आयोग ने गर्मी के चुनावों पर असर को आँकने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया था पर अधिकारी ने कहा कि जहाँ तक उन्हें मालूम है, यह काम नहीं किया गया था। वह कहते हैं, “हम प्रचार और राजनीतिक रैलियों की निगरानी नहीं करते। हम यह राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों पर छोड़ देते हैं कि वे स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से ज़रूरी एडवाइज़रियाँ जारी करें।” अर्चना पटनायक तमिलनाडु की मुख्य निर्वाचन अधिकारी हैं। वह कहती हैं कि गर्मी में प्रचार के लिए एक चेकलिस्ट है जिसका पालन ज़रूर किया जाना चाहिए। वह जोड़ती हैं, “जनसभाओं की जगहों पर लोगों की सुविधा के लिए छांव, आश्रय, पानी और मेडिकल सहायता का इंतज़ाम होना चाहिए। मूल रूप से, हीटवेव के बारे में अगर कोई एडवाइजरी जारी की गई है तो सबके द्वारा उसके ‘क्या करें क्या न करें’ निर्देशों का पालन किया जाना है।” पर कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह काफ़ी नहीं है। तमिलनाडु जलवायु परिवर्तन शासन परिषद के सदस्य जी. सुंदरराजन कहते हैं, “चुनाव आयोग को अब तक पार्टियों को यह एडवाइजरी दे देनी चाहिए थी कि वो दोपहर की गर्मी में रैलियां नहीं कर सकते। पर अभी तक उन्होंनें ऐसा नहीं किया है।” गर्मी और स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि फिर भी कुछ ऐसे समाधान हैं जिन्हें अपेक्षाकृत आसानी से लागू किया जा सकता है: जैसे रैली का समय बदलना, आयोजन से पहले गर्मी से खतरे का जायजा लेना, अनिवार्य कूलिंग ज़ोन, मेडिकल कर्मचारी, भीड़ का घनत्व सीमित करना, और खतरे के निशान तय करना जिनके पार खुले में राजनीतिक आयोजनों की अनुमति ही न हो। पर सिर्फ़ एडवाइज़रियाँ ही काफ़ी नहीं हैं, बहुतों का मानना है कि प्रचार अभियानों की कड़ी निगरानी की ज़रूरत हैं ताकि वो नियमों का पालन करें। भारत बड़ी भीड़ में गर्मी के असर की तैयारी से बार बार जूझता है। 2024 में तमिलनाडु में मरीना बीच एयर शो में और 2023 में महाराष्ट्र में एक सरकारी पुरस्कार समारोह में हुई मौतें यह दर्शाती हैं। एनआरडीसी इंडिया के जलवायु लचीलापन और स्वास्थ्य प्रमुख अभियन्त तिवारी कहते हैं, “सिर्फ़ एडवाइज़रियों से एक्शन नहीं होता। यहाँ एक कठोर निगरानी और लागू करने की प्रक्रिया की ज़रूरत है।” तापमान के परे यूटीसीआई के प्रयोग के बारे में 2021 की एक किताब के अनुसार, भारत में इस्तेमाल होने वाले गर्मी की निगरानी और मानव स्वास्थ्य पर असर का आकलन करने वाले तरीकों की तुलना में अधिक उन्नत तरीके वैश्विक रूप से मौजूद हैं। यूरोप भर में यूटीसीआई सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र में शामिल है, और गर्मी के खतरों का अनुमान लगाने और उनसे निपटने में प्रशासन की मदद करता है। किताब ज़िक्र करती है कि पोलैंड में 32C से ऊपर के यूटीसीआई को मृत्यु दर में 25% से ज़्यादा की बढ़ोतरी से जोड़ा गया है जो पब्लिक एडवाइज़रियों और तैयारियों को निर्देशित करता है। पुर्तगाल में उच्च-रेजोल्यूशन यूटीसीआई अनुमान नागरिक सुरक्षा एजेंसियों से साझा किए जाते हैं। शोध दर्शाते हैं कि इससे लक्षित हस्तक्षेप जैसे संवेदनशील आबादी की सुरक्षा के लिए आपातकालीन योजनाओं में मदद मिलती है। किताब के अनुसार, यूटीसीआई डेटा अखिल-यूरोपीय निर्णय-सहायता प्रणालियों को भी जानकारी प्रदान करता है, जिन्हें प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता भीषण मौसमी घटनाओं की तैयारी में इस्तेमाल करते हैं। ये प्रणालियां जटिल जलवायु डेटा को स्पष्ट और कार्रवाई योग्य मार्गदर्शन में बदल कर प्रतिक्रियाओं को तात्कालिक प्रतिक्रिया की जगह रोकथाम की ओर ले जाती हैं। पर भारत में, योजनाओं और जोखिम आकलन में ऐसे साधनों को शामिल किए बिना ही बड़े चुनावी आयोजन खुले में जारी हैं।जैसे जैसे तापमान बढ़ता है, इसके परिणाम और स्पष्ट हो जाते हैं। मौजूदा चुनावों में लगभग पाँच में से एक मतदाता ही मतदान के लिए जा पाएगा, यह इस ओर संकेत करता है कि गर्मी के कारण कुछ लोगों के लिए अपने राजनीतिक अधिकारों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा। कुछ लोग तो इन्हें छोड़ने पर ही मजबूर हो सकते हैं। दूसरे भाग में हम मतदान के दिन की गतिविधियों की समीक्षा करेंगे: कैसे गर्मी मतदान प्रतिशत पर असर डालती है, कौन परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर हो जाता है, और गर्म होती दुनिया में चुनावों को सुरक्षित बनाने के लिए क्या करना होगा। यह लेख द ज़ाइलम और डायलॉग अर्थ के सहयोग से तैयार किया गया है। लगातार पढ़ें आलेख हीट अडॉप्टेशन शहरों की हीट प्लानिंग की खामियों का बोझ कमज़ोर वर्ग पर आलेख खनन खनन के बढ़ते दबाव के बीच अरावली बचाने की लड़ाई आलेख हीट अडॉप्टेशन चर्चा: COP30 में स्वास्थ्य पर कितना गंभीर रहा एजेंडा? आलेख मछली पालन शार्क पहचान में कठिनाई, भारतीय मछुआरों में जुर्माने को लेकर चिंता आलेख स्वास्थ्य बढ़ती गर्मी से परेशान रेहड़ी-पटरी वाले आलेख वैश्विक तापन क्यों हीट चेतावनियों को और स्थानीय होने की 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