प्रकृति बदलते लैंडस्केप और बच्चों के बीच बढ़ता डर: कश्मीर में मानव-वन्यजीव संघर्ष कश्मीर में जंगली जानवरों के हमले ग्रामीण समुदायों को प्रभावित कर रहे हैं। इस बीच अधिकारी और संरक्षणवादी इस समस्या की जड़- जानवरों के हैबिटैट की बर्बादी- को सुलझाना चाहते हैं और उसका समाधान खोज रहे हैं। हिन्दी हिन्दी English Share this article × Copy link to page Copy link to page × पुन: प्रकाशन अगर आप हमारी प्रकाशन नीति की शर्तों या सामग्री का उपयोग करने की अनुमति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो [email protected]पर हमें संपर्क करें। आकिब फ़याज़ , दानिश काज़ी अक्टूबर 12, 2022October 28, 2022 इस साल जून में उत्तरी कश्मीर के एक दूर और एकांत हिस्से में एक आठ वर्षीय बच्ची इकरा जान पर एक तेंदुए ने उसके घर के पास हमला कर दिया। तबसे इकरा सदमे में है। ख़ुशक़िस्मती से वह उस हमले में बच गई। वो उस वक़्त अपनी मां के साथ थी और एक जंगली पहाड़ी पर अपने परिवार की गायों को चरा रही थी। पिछले हफ़्ते, उसी तेंदुए ने पास के एक इलाके में दो अन्य बच्चों पर भी हमला किया था। वो हमले में नहीं बच पाए। उस क्षेत्र के वन्यजीव विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2010 की शुरुआत से मार्च 2020 के अंत तक, तेंदुए और भालू सहित जंगली जानवरों ने कश्मीर में 166 लोगों पर हमला करके उन्हें मार डाला और 2,659 को घायल कर दिया। (ये डेटा द् थर्ड पोल को प्रिंट फॉर्म में दिया गया है और यहां ऑनलाइन देखा जा सकता है।) वन्यजीव वार्डन इंतेसर सुहैल के अनुसार, ये संख्या 1990 के दशक की तुलना में काफी अधिक है। पिछले एक दशक में कश्मीर में मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए ठोस प्रयास किए गए हैं। घाटी में वन्यजीव विभाग नियंत्रण कक्ष स्थापित किए गए हैं, वन रक्षकों के लिए बेहतर प्रशिक्षण और उपकरण और समुदायों के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी बनाए गए हैं। तुलनात्मक रूप से, इस प्रयास की वजह से पिछले कुछ वर्षों में मौतों और चोटों की संख्या में कमी हुई है। लेकिन इस साल अब तक 10 से अधिक मौतों के साथ, समुदायों में विशेष रूप से दूरदराज के इलाकों में चिंता की भावना है। दुनिया के इस हिस्से में विश्वसनीय डेटा मिलना बहुत मुश्किल है – लेकिन रिपोर्टिंग की वजह से वन्यजीवों के हमलों की संख्या पता चल पाई है। कश्मीर में मोबाइल फोन के उपयोग में वृद्धि और इंटरनेट की वजह से अधिक लोग जागरूक हैं और वो समझते हैं कि उन्हें वन्यजीवों के हमलें रिपोर्ट करनी चाहिए और इसे करने के आसान तरीके भी हैं। बेहतर रिपोर्टिंग से अधिकारियों को घटनाओं से तेजी से निपटने में मदद मिलती है, घायल लोगों और जानवरों दोनों को बचाया जा सकता है। लेकिन समस्या का मूल कारण अभी अनियंत्रित है और बदतर होता जा रहा है: सीमाओं से घिरे हुए कश्मीर के वन्यजीव दबाव में हैं। इस दबाव का कारण है लोगों की जनसंख्या में बढ़ोतरी और इन जानवरों के आवास का विनाश। वन्यजीव विभाग और वन्यजीव एसओएस जैसे संरक्षण एनजीओ लोगों और जानवरों के साथ रहने के तरीके खोजने के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन जब ऐसे हमले होते हैं, तो समुदाय के लोग अक्सर ग़ुस्से से उबल जाते हैं। पूरी की पूरी भीड़ शिकार करने और उस जानवर को मारने के लिए इकट्ठा हो जाती है। यह एक कारण है कि वन्यजीव विभाग ने हमले होने पर कुशलता से प्रतिक्रिया करने की अपनी क्षमता बढ़ा दी है – बढ़े हुए तनाव केवल स्थिति को अक्सर ख़राब कर देते हैं। लेकिन इंतेसर सुहैल और संरक्षणवादी आलिया मीर दोनों के लिए, मानव-वन्यजीव संघर्ष से वास्तव में निपटने का एकमात्र तरीका उन आवासों को संरक्षित और पुनर्स्थापित करना है, जिन पर कश्मीर के जंगली जानवर आश्रय और भोजन के लिए निर्भर हैं। इस खूबसूरत हिमालयी क्षेत्र के “बेज़ुबान साथियों” को अपने लोगों की तरह ही एक घर की ज़रूरत है। प्रोडक्शन क्रेडिट: आकिब फ़याज़ और दानिश काज़ी द्वारा निर्देशित।आकिब फ़याज़ और दानिश काज़ी द्वारा निर्मित।दानिश काज़ी द्वारा फिल्माया गया।काशिफ शकील द्वारा एडिटेड।लिज़ी हेस्लिंग और ऐरन वाईट को धन्यवाद। कॉपीराइट नोटिस: यह वीडियो एक क्रिएटिव कॉमन्स एट्रिब्यूशन गैर-व्यावसायिक लाइसेंस के तहत जारी किया गया है। यदि आप इसे साझा करना चाहते हैं या इसका उपयोग करना चाहते हैं, तो कृपया इस लाइसेंस की शर्तों का सम्मान करें। निःशुल्क कॉपी के लिए कृपया हमसे संपर्क करें: [email protected]। अनुरोध पर फुटेज की एक क्लिपरील भी उपलब्ध है। लगातार पढ़ें आलेख लुप्तप्राय प्रजातियां तस्करी के चलते विलुप्त हो रहा भारत का सबसे खूबसूरत कछुआ आलेख जैव विविधता नेपाल के एवरेस्ट में हिमालयी भेड़ियों की दहशत फोटो स्टोरी जैव विविधता लॉकडाउन में बढ़ गया 'पक्षियों के स्वर्ग' में संघर्ष आलेख लुप्तप्राय प्रजातियां आखिर क्यों भटक रहे हैं भालू? आलेख ऊर्जा संक्रमण विश्लेषण: फ़ॉसिल फ़्यूल या रीनूअबल एनर्जी, कहां अधिक खर्च कर रहा है भारत? आलेख मानव अधिकार जलवायु परिवर्तन की वजह से गंगा डेल्टा में स्कूल छोड़ रहे हैं बच्चे आलेख हाइड्रोपावर नेपाल की कुछ बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में चीन की जगह ले रही हैं भारतीय कंपनियां आलेख तकनीक भारत और बांग्लादेश में बाढ़ से सुरक्षा में मदद कर सकते हैं ये 4 इनोवेशंज़