जलवायु गर्मी से बचाव में मदद के लिए बचत पर ध्यान ज़रूरी शहरों की नीतियों में उत्सर्जन से ज्यादा ठोस नतीजे और कम बिजली बिल पर ध्यान होना चाहिए, ज़ुबैर शेख और श्राव्या गरुड़ा कहते हैं हिन्दी हिन्दी Español English Share this article × Copy link to page Copy link to page × पुन: प्रकाशन अगर आप हमारी प्रकाशन नीति की शर्तों या सामग्री का उपयोग करने की अनुमति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो [email protected]पर हमें संपर्क करें। जैसे-जैसे भारत के शहरों में तेज गर्मी बढ़ रही है, पारंपरिक पंखे जैसे साधन अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं। ऐसे में जलवायु से जुड़े प्रयासों का ध्यान अब अधिक असरदार, ऊर्जा की बचत करने वाले और लंबे समय तक फायदा देने वाले उपायों की ओर बढ़ रहा है। (तस्वीर: पैसिफिक प्रेस मीडिया प्रोडक्शन कॉर्प / अलामी) ज़ुबैर शेख, श्राव्या गरुड़ा मार्च 26, 2026April 28, 2026 अत्यधिक गर्मी अब एक अदृश्य आपदा बन चुकी है, जो धीरे-धीरे भारत के शहरों में लोगों के जीवन को बदल रही है। इसकी मार सबसे ज्यादा उन लोगों पर पड़ती है, जिनके पास इससे बचने के सीमित साधन हैं। गर्मी से निपटने के तरीके, रहने की आदतें और रोज़मर्रा की जिंदगी – सब कुछ इस बढ़ते तापमान के साथ बदलता जा रहा है। लगभग 57% भारतीय जिले, जहां देश की तीन-चौथाई से ज्यादा आबादी रहती है, अब उच्च से बहुत उच्च जोखिम वाले माने जाते हैं। शहरों में रहने वाले लोग खास तौर पर ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव के कारण शहर आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा गर्म हो जाते हैं। अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव क्या है? शहर अक्सर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा गर्म होते हैं। इसके कई कारण होते हैं जैसे छाया और ठंडक देने वाले पेड़ों की कमी, कंक्रीट और ईंट की इमारतों की अधिकता जो गर्मी को सोख लेती हैं, और ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल होने से निकलने वाली अतिरिक्त गर्मी। इन सभी कारणों से जो स्थिति बनती है, उसे “अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव” कहा जाता है। कई घरों में रहने की स्थिति गर्मी को और बढ़ा देती है। एस्बेस्टस की छतें, खराब हवा का आवागमन (वेंटिलेशन) और भीड़भाड़ घर के अंदर तापमान बढ़ा देते हैं। वहीं बाहर छाया या खुले स्थानों की कमी भी समस्या को बढ़ाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से स्वास्थ्य पर असर और मौतों की संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन सिर्फ उत्सर्जन घटाने की बात अक्सर लोगों को बदलाव के लिए प्रेरित नहीं करती। हमें इस मुद्दे पर अलग तरीके से, यानी लोगों के अनुकूल ढलने (एडाप्टेशन) पर ज्यादा ध्यान देते हुए बात करनी होगी। नीति बनाने वालों के लिए लक्ष्य लोगों की जान बचाना या उत्सर्जन कम करना हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति एयर कंडीशनर (एसी) खरीद रहा है, उसके लिए प्राथमिकता आमतौर पर आराम और खर्च होती है। यह लेख मुंबई क्लाइमेट वीक के दौरान शहरी गर्मी पर आयोजित डायलॉग अर्थ पैनल, “क्या भारत ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के लिए बहुत ज्यादा गर्म होता जा रहा है?” से निकला है। इसमें भाग लेने वाले सभी लोगों का धन्यवाद। इमारतों को बेहतर बनाना शहरों में रहने वाले वे लोग, जिनके पास एसी, फ्रिज और दूसरे घरेलू उपकरण हैं, हीट आइलैंड प्रभाव में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं। अक्सर वे ठंडक पाने के लिए ऊर्जा-कुशल तरीके नहीं अपनाते। Tआज के समय में सबसे आम समाधान अलग-अलग एसी का इस्तेमाल है। लेकिन पूरे भवन या किसी इलाके के लिए एक साथ काम करने वाली प्रणालियों जैसे हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग या डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम के जरिए लागत और उत्सर्जन दोनों कम किए जा सकते हैं। हालांकि, इन पर शुरुआत में ज्यादा निवेश करना पड़ता है, खासकर निर्माण के समय। भारत सहित कई जगहों पर बिल्डर जल्दी बेचकर आगे बढ़ना। व्यावसायिक इमारतों में ऊर्जा दक्षता (एनर्जी एफिशिएंसी) को बढ़ावा मिला है, क्योंकि बड़ी कंपनियां अब इसकी मांग करती हैं। लेकिन रिहायशी इमारतों में खरीदार आमतौर पर कीमत और लोकेशन पर ज्यादा ध्यान देते हैं, और ऊर्जा दक्षता उनकी प्राथमिक सूची में नहीं होती। ऐसे में बिल्डरों के पास शुरुआत में ज्यादा खर्च करने का खास कारण नहीं होता। जब उपभोक्ता लंबे समय में होने वाली बचत को समझते हैं, तो वे बेहतर और ऊर्जा-कुशल विकल्पों की मांग करने लगते हैं। इससे बिल्डरों पर भी बेहतर कूलिंग समाधान अपनाने का दबाव बन सकता है। भारत में नए निर्माण (ग्रीनफील्ड डेवलपमेंट) तेजी से हो रहे हैं, जो एक बड़ा मौका देते हैं। आने वाले वर्षों में देश में लाखों वर्गफुट नई इमारतें बनने की उम्मीद है, जहां प्रेस्टिज ग्रुप, हिरानंदानी ग्रुप और पुरावनकारा लिमिटेड जैसे डेवलपर्स मध्यम वर्ग के लिए किफायती से लेकर अत्याधुनिक लक्जरी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। समाधान की तलाश हालांकि यह पूरी तरह परफेक्ट नहीं है, लेकिन मौजूदा इमारतों में बदलाव (रेट्रोफिटिंग) करके उन्हें ज्यादा ऊर्जा-कुशल बनाना फायदेमंद हो सकता है। बेहतर ऊर्जा रेटिंग वाले उपकरणों का इस्तेमाल, छत पर सोलर जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को जोड़ना, और सामान्य पंखों की जगह ब्रशलेस पंखों का उपयोग करना। ये सब मिलकर बड़ा सुधार ला सकते हैं और अतिरिक्त गर्मी भी कम करते हैं। यह एक CATCH स्टोरी हैयह लेख डायलॉग अर्थ के कम्युनिटी अडैप्टेशंस टू सिटी हीट (CATCH) प्रोजेक्ट के तहत तैयार किया गया है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी में किया गया है। इस प्रोजेक्ट को वेलकम का सहयोग मिला है। डायलॉग अर्थ की सभी सामग्री संपादकीय रूप से स्वतंत्र है।CATCH से जुड़ी और खबरें पढ़ें। कुछ शहरों में, अगर रिहायशी परियोजनाओं में ऊर्जा दक्षता के उपाय अपनाए जाएं और उनका सही आकलन किया जाए, तो हाउसिंग सोसायटी को प्रॉपर्टी टैक्स में छूट मिल सकती है। इससे निवासियों के बिजली बिल भी कम होते हैं। यहां तक कि छोटे कदम जैसे पार्किंग और सामुदायिक शौचालयों में मोशन सेंसर लाइट लगाना भी अच्छी-खासी बचत करा सकते हैं। हैदराबाद और चेन्नई में कुछ रिहायशी परियोजनाओं ने सेंट्रल चिलर सिस्टम लगाए हैं। 2015 में हैदराबाद की एक हाउसिंग सोसायटी में डेवलपर्स ने सामुदायिक कूलिंग प्लांट का प्रयोग किया, जिससे हर घर की बाहरी दीवार पर अलग-अलग एसी लगाने की जरूरत नहीं पड़ी। शुरुआत में फ्लैट मालिक हिचकिचा रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे अपनाया, और लगभग एक दशक से कूलिंग का खर्च स्थिर बना हुआ है। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें सभी को फायदा हुआ। असली बचत ही लोगों को ऐसे बदलाव अपनाने के लिए प्रेरित करती है। ऊर्जा दक्षता (एनर्जी एफिशिएंसी) की उच्च रेटिंग वाले उपकरणों के साथ घरों में बदलाव (रेट्रोफिटिंग) करने से परिवार अपने बिजली बिल में काफी कमी ला सकते हैं (तस्वीर: सिपा यूएसए / अलामी) ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के भीतर ऊर्जा-कुशल कूलिंग के लिए एक अलग विभाग बनाया जाए, तो इससे बदलाव की रफ्तार और तेज हो सकती है। सबसे कमज़ोर वर्ग को न भूलें अत्यधिक गर्मी का सामना कर रहे कमजोर समुदायों के लिए अब भी बहुत कम समाधान उपलब्ध हैं। कुल उत्सर्जन में उनका योगदान बहुत कम होता है, फिर भी बढ़ते तापमान का सबसे ज्यादा असर अक्सर उन्हीं पर पड़ता है।कम आय वाले इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोग किराए पर रहते हैं। घर उनका अपना नहीं होता, इसलिए वे उसमें बदलाव नहीं कर सकते – न खिड़कियां या दरवाजे बदल सकते हैं, न ही बेहतर हवा के लिए कोई व्यवस्था कर सकते हैं। इन इलाकों में रहने की जगह भी बहुत तंग होती है। मुंबई के पास मीरा-भायंदर इलाके में अक्सर 150 से 200 वर्गफुट के छोटे से घर में, जो एक छोटे स्टूडियो अपार्टमेंट जितना होता है, आठ तक लोग रहते हैं। छतें भी नीची होती हैं। ऐसे हालात में पंखे ज्यादा राहत नहीं दे पाते, और लोग आराम के लिए बाहर बगीचों या पेड़ों के नीचे जाने को मजबूर हो जाते हैं, क्योंकि घर के अंदर रहना मुश्किल हो जाता है। तमिलनाडु और केरल के कुछ हिस्सों में कोयर (नारियल रेशा) की छत और कूलिंग पेंट जैसे प्राकृतिक ठंडक देने वाले उपाय अपनाए गए हैं, जिनके अच्छे नतीजे मिले हैं। लेकिन मुंबई जैसे बड़े शहरों में झुग्गियां बहुत घनी होती हैं और घर अनौपचारिक तरीके से बने होते हैं, जिससे उनमें बदलाव करना मुश्किल हो जाता है। कई जगहों पर छतें कमजोर होती हैं, इसलिए हल्के बदलावों के अलावा कुछ और करना आसान नहीं होता।कम आय वाले परिवारों की प्राथमिकताएं भी अलग होती हैं – किराया, खाना, शिक्षा और स्वास्थ्य पहले आते हैं। ऐसे में गर्मी से बचाव के लिए घर में सुधार उनकी सूची में बहुत नीचे रह जाता है, क्योंकि शुरुआत में खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल होता है, भले ही इसके फायदे साफ दिखते हों। ऐसे बदलावों के लिए पैसा जुटाने की जिम्मेदारी सिर्फ इन परिवारों पर नहीं होनी चाहिए। इसमें सरकार और शहर की संस्थाओं की मुख्य भूमिका होनी चाहिए, साथ ही जलवायु फंड, विकास एजेंसियों और निजी क्षेत्र का सहयोग भी जरूरी है। इन योजनाओं को हाउसिंग सोसायटी और सामुदायिक समूहों, जैसे बचत समूह, के जरिए लागू किया जा सकता है।यह भी महत्वपूर्ण है कि कमजोर समुदाय पूरी तरह निर्भर नहीं हैं। वे पहले से छोटे-छोटे तरीकों से खुद को ढाल रहे हैं और सस्ती व भरोसेमंद समाधान मिलने पर निवेश करने के लिए तैयार भी हैं। उदाहरण के तौर पर, मीरा-भायंदर में कुछ लोगों ने गर्मी रोकने के लिए अपनी छत के नीचे थर्मोकोल की शीट लगाई हुई थी, जो कम लागत वाला विकल्प है। वहीं, जहां लकड़ी के रेशों (वुड वूल) से बने पैनल की छत लगाई गई, वहां कुछ परिवारों ने एलईडी लाइट भी लगाई, जो पुराने बल्बों की तुलना में कम गर्मी पैदा करती हैं।यह साफ है कि समुदाय गर्मी से जुड़ी समस्याओं को समझते हैं और समाधान अपनाने के लिए तैयार भी हैं, खासकर जब वे आसान हों और उनके ठोस फायदे दिखें- जैसे घर के अंदर कम तापमान और कम बिजली बिल। ऐसे उपायों का इस्तेमाल और बढ़ सकता है, अगर लोगों को इनके बारे में जानकारी मिले, वे इन्हें आसानी से हासिल कर सकें और वहन कर सकें। जब समुदाय मिलकर संसाधन जुटाते हैं, सरकारी प्रोत्साहन का फायदा उठाते हैं और निवेश का स्पष्ट लाभ देखते हैं, तो सुधार संभव हो जाता है। जरूरत है एक ऐसे वित्तीय ढांचे की, जो आसान, सुलभ और उनकी वास्तविक जरूरतों के मुताबिक हो। लोग तकनीकी शब्दों से ज्यादा सीधे आर्थिक फायदे को समझते हैं। इसलिए कार्बन उत्सर्जन जैसी जटिल बातों पर जोर देने के बजाय, हमें व्यावहारिक नतीजों- पैसे की बचत और बेहतर जीवन-पर ध्यान देना चाहिए। यही लोगों को साथ जोड़ता है। लगातार पढ़ें आलेख खनन खनन के बढ़ते दबाव के बीच अरावली बचाने की लड़ाई आलेख हीट अडॉप्टेशन चर्चा: COP30 में स्वास्थ्य पर कितना गंभीर रहा एजेंडा? आलेख मछली पालन शार्क पहचान में कठिनाई, भारतीय मछुआरों में 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