उखड़ापहाड़ी जंगल के बीचोंबीच बसा एक गांव है। गांव की सीमा पर फैली विरल घास पर गाएं शांत भाव से चर रही हैं। आसपास की लाल मिट्टी वाली ज़मीन पर मुर्गियां और बकरियां घूम रही हैं, जो किसी कार के आने की आवाज़ से अचानक चौंक उठती हैं—यहां ऐसी हलचल कम ही होती है। गांव के बीचोंबीच बांस के छप्पर के नीचे मर्सिला टुडू बैठी हैं। उनकी नाक की सोने की नथिया धूप में चमक रही है और बालों में खोंसा लाल फूल उनकी मौजूदगी को और उभार रहा है।
यही वह छप्पर है जिसके नीचे हफ्ते में एक बार पूरा गांव जुटता है—खेती पर बात करने के लिए, रीति-रिवाजों पर चर्चा करने के लिए, स्थानीय विवादों को सुलझाने के लिए। यहां वे जीवन पर भी चर्चा करते हैं।
यहाँ कोई हॉल, दीवारें या कंक्रीट की बेंचें नहीं हैं। चमकदार साड़ियों में महिलाएँ एक नारंगी तिरपाल पर एक साथ बैठी हैं और बच्चे उनके सामने खेल रहे हैं। उनके बाएँ पुरुष इकट्ठा हैं, कुछ बैठे हैं तो कुछ खड़े होकर देख रहे हैं। छप्पर लकड़ी के खंभों पर टिका है जो ख़ुद जंगली आम और महोगनी के पेड़ों की छाँव में है। यह छप्पर धूप से बचने का उनका इकलौता उपाय है। जैसे जैसे लोग अंदर आते हैं वे एक दूसरे का अभिवादन एक ही शब्द से करते हैं। इस शब्द का अर्थ आदर भी है और प्रणाम भी। ये शब्द उनके अपने होने का निशान है।
“जोहार।”
पाँच महीने पहले, टुडू और उनके पति बघल हेम्ब्रम इस रोज़ाना की बैठक में मौजूद नहीं थे। वे 2000 किलोमीटर से भी अधिक दूर केरल के इडुक्की ज़िले में इलायची के बाग़ान में काम कर रहे थे। उन्हें झारखंड के दुमका जिले के उखड़ापहाड़ी गांव से वहाँ तक के सफर में बस से चार दिन लगे थे। वहाँ माचिस के डिब्बे जैसा 8 बाई 8 फीट का एक कमरा उनका इंतज़ार कर रहा था। घर पर कोई पैसे नहीं थे। पर यहाँ केरल में कड़ी मेहनत करके वो दिन के 500 रुपए प्रति व्यक्ति कमा लेते थे, जो उखड़ापहाड़ी में घर बनाने के लिए रेत, पत्थर और अन्य कंस्ट्रक्शन मटेरियल के लिए काफ़ी था।
“अब जब हमने पर्याप्त पैसे बचा लिए हैं, हम वापस नहीं जाना चाहते,” टुडू कहती हैं।
उनका छोटा सा गाँव सिर्फ़ रहने की जगह से बढ़कर था। ये उनकी पहचान का हिस्सा था। यहाँ सब लोग संथाल थे। सब लोग संथाली बोलते थे। यह सुरक्षित था। यह उनका घर था।
जून में डायलॉग अर्थ ने दुमका का दौरा किया और 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उखड़ापहाड़ी और बुढ़ीडंगाल गांवों के आदिवासी परिवारों और समुदाय के नेताओं से बात की, और पाया कि प्रवास अब तेजी से स्थायी होने की जगह अस्थायी हो रहा है। बाहर जाने वाले निवासी अब कहीं और बसने की मंशा से नहीं जाते। वो इसलिए जाते हैं ताकि वो घर बनाने और शादियों के खर्च और क़र्ज़ से बचने के लिए पैसे कमा सकें जो गाँव में संभव नहीं है। और वो इन जरूरतों के पूरा हो जाने पर लौट आते हैं।
विशेषज्ञ डायलॉग अर्थ को बताते हैं कि झारखंड में इस पलायन को दो वजहें आकार देती हैं। पहली यह कि खनन, खेत में मजदूरी की आय में गिरावट, अनियमित बारिश और सरकार की संवेदनहीनता के कारण आदिवासी जीवन की संधारणीयता ख़त्म हो रही है। और दूसरी कि वे गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल, जैसे राज्यों में जाते हैं जहाँ वे शोषण और अपनी भाषा, ज़मीन और समुदाय से गहरा अलगाव झेलते हैं।
उदाहरण के लिए, स्थानीय रिकॉर्डों के अनुसार बुढ़ीडंगाल और उखड़ापहाड़ी में क्रमशः 65 और 42 घर हैं। पर समुदाय के नेता अनुमान लगाते हैं कि इनमें से आधे घरों से कम से कम एक सदस्य राज्य के बाहर काम कर रहा है। बाहर जाने वाले बहुत से लोग लौट आए हैं। बाक़ी लोग आते जाते रहते हैं। यह पैटर्न इन दो गाँवों के बाहर भी लागू होता है: 2023 के झारखंड प्रवासन सर्वेक्षण से पता चलता है कि दुमका में लगभग 2,73,000 वर्तमान प्रवासी थे और क़रीब 39,000 “लौटे हुए प्रवासी” थे।
दुमका में, दूर जाना ही अपने घर से जुड़े रहने का रास्ता बन गया है।
जहाँ जंगल सिमटने लगता है
दूर से देखने पर जंगल अनछुए लगते हैं। मानसून के दौरान, पहाड़ियाँ हरियाली से ढक जाती हैं, जल धाराएँ इलाके को चीरकर निकलती हैं जो कभी कभी प्राकृतिक झरनों के रूप में नीचे गिरती हैं। केवल सड़कों और रेल की पटरियों पर ही एक दूसरी पहचान उभरने लगती है। खदानों के पास ट्रकों की लंबी क़तारें, काली हो गई मिट्टी में उनके टायरों के निशान। उखड़ापहाड़ी और बुढ़ीडंगाल से 30 किलोमीटर दूर दुमका शहर के रेलवे स्टेशन पर कोयले की बोगियों की कतारें लगी रहती हैं, उनकी कालिख इतनी पक्की होती है कि स्टेशन प्लेटफॉर्म की टेराकोटा टाइलों की दरारों में जम जाती है और धोने से भी नहीं छूटती।
झारखंड भारत के सबसे बड़े कोयला उत्पादक राज्यों में से एक है और 2017 से 2025 के बीच यहां कोयला उत्पादन में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। जुलाई 2026 तक दुमका खनन कार्यालय के तहत 23 कोयला खनन पट्टे दर्ज हैं। क्षेत्र की आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठन लहंती के परियोजना समन्वयक विन्सेंट मुर्मू का कहना है कि खनन ने उन जंगलों को बदल दिया है, जिनके इर्द-गिर्द आदिवासी समुदायों ने लंबे समय से अपना जीवन व्यवस्थित किया है।
पीढ़ियों से, परिवार भोजन, ईंधन, दवा और पूरक आमदनी के लिए जंगलों पर निर्भर रहे हैं। वे रोज़ के पोषण के लिए मौसमी फल और जंगली पत्तेदार सब्ज़ियाँ इकट्ठा करते हैं। साल के पत्ते, महुआ के फूल, तेंदू के पत्ते और शहद अतिरिक्त आमदनी का स्रोत हैं। “पर जंगल भी हमारे आसपास से ख़त्म हो रहा है,” उखड़ापहाड़ी गांव के नेता लवीन हेम्ब्रम कहते हैं।
दोनों गांवों ने वन अधिकार अधिनियम के तहत अपने सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के लिए आवेदन किए हैं। यह कानून वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को उन जंगलों पर पारंपरिक अधिकार देता है, जिनका वे परंपरागत रूप से इस्तेमाल करते आए हैं। लेकिन ये अधिकार अभी मिलने बाक़ी हैं। लहांती के प्रोग्राम मैनेजर अविजित कर्माकर कहते हैं, “जब तक उन्हें मान्यता नहीं मिलती, समुदाय जंगलों पर अपने दीर्घकालिक नियंत्रण को लेकर उलझन में हैं। जब खनन होता है, तो निष्कर्षण के लिए जंगल साफ़ कर दिए जाते हैं। लोगों को डर है कि कहीं अगली बारी उनकी न हो।”
इन गांवों के सबसे नज़दीक वाली बड़ी खदानें ओपन-कास्ट माइनिंग वाली हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा जारी 2016 की एक रिपोर्ट, जिसका शीर्षक “जब ज़मीन चली जाए, तो क्या हम कोयला खाएँ?” है, के अनुसार ऐसी माइनिंग के लिए ज़मीन की सतह पर मौजूद वनस्पति को हटाया जाता है, कोयला भंडारों के ऊपर की मिट्टी को विस्फोट करके उड़ाया और साफ़ किया जाता है, फिर उसके बाद पट्टियों में कोयला निकाला जाता है। हालांकि ओपन-कास्ट माइनिंग की लागत अपेक्षाकृत कम होती है, पर इसका पर्यावरण पर असर बेहद बड़ा और हानिकारक होता है, जिसमें धूल, ध्वनि प्रदूषण, के अलावा ज़मीन का उपजाऊपन घटना, जंगलों की कटाई और मिट्टी का कटाव शामिल हैं।
बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि पहले वे खाने के लिए कई प्रकार की जंगली पत्तेदार सब्ज़ियाँ इकट्ठा करते थे। पर अब उनमें से सिर्फ़ आधी या उससे कम ही आदिवासी गांवों के आसपास पाई जाती हैं। कर्माकर कहते हैं, “हमारा मानना है कि जंगल से मिलने वाले भोजन की विविधता कम होने का असर पोषण पर पड़ रहा है।”
समाजशास्त्री और भारत के प्रमुख आदिवासी शोधकर्ताओं में एक वर्जिनियस ज़ाक्सा कहते हैं कि पूरे भारत में आदिवासी परिवारों की ज़मीनों का आकार लगातार घटता गया है। इसकी एक वजह तो यह है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़मीन परिवारों के भीतर बंटती जाती है, लेकिन इसके अलावा क़र्ज़, अलगाव और डराने-धमकाने के चलते भी ज़मीन हाथ से निकल जाती है। “हालांकि अभी भी बहुत से परिवारों के पास कुछ ज़मीन है, पर ये उनके साल भर के गुजारे के लिए काफ़ी नहीं है,” ज़ाक्सा कहते हैं। ऐसी ज़मीन आमतौर पर खेती और पशुपालन के लिए इस्तेमाल की जाती थी।
आसपास के जंगलों से जुड़ी मामूली से लेकर गहरी सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। हर संथाली शादी में साल के पेड़ की डाल ज़रूरी होती है। पर जैसे जंगल बदल रहे हैं, साल की टहनियाँ मिलनी मुश्किल होती जा रही हैं, जिसके कारण कुछ परिवार एक ही टहनी को कई शादियों में इस्तेमाल करने लगे हैं। लाहंती के कर्माकर कहते हैं, “जंगल है तो आदिवासी है। आदिवासी है तो जंगल है।”
जब पानी लाना ही बन जाए काम
हर शाम, बुढ़ीडंगाल में गांव की बैठक से पहले स्टाइन सिला हंसदा अपनी बगल में धातु के बर्तन खोंसती हैं और निकल पड़ती हैं। उनका पहला सफ़र सूरज उगने से बहुत पहले होता है, और आख़िरी सूरज डूबने तक। कभी कभार वो घिसी चप्पलें पहनती हैं, पर ज्यादातर समय उनके गट्टे पड़े पैर नंगे ही ऊबड़-खाबड़ और नुकीली चट्टानों के संकरे रास्ते नापते हैं। वो लगभग आधा घंटा चलती हैं तब जाकर रास्ते के 30 फीट नीचे उन्हें पानी दिखाई देता है। अपने आसपास की दूसरी महिलाओं की तरह ही वह खाली बर्तन लिए खड़ी ढलानों से नीचे उतरती हैं, और फिर घर के लिए ज़रूरी पानी लेकर मुश्किल से ऊपर चढ़ती हैं।
यह प्राकृतिक तालाब गंदा है, जिसे मवेशी और जंगली जानवर भी इस्तेमाल करते हैं। इसका पानी पीने से कुछ परिवारों में बीमारी भी हुई है, लेकिन कोई और विकल्प नहीं है। यहाँ तक कि गर्भवती महिलाओं को भी वही मुश्किल पैदल यात्रा करनी पड़ती है और वही पानी पीना पड़ता है। हंसदा कहती हैं, “हमें कई-कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे बेहद थकान होती है।”
न तो उखड़ापहाड़ी और न ही बुढ़ीडंगाल में पाइपलाइन के जरिए पानी की कार्यशील आपूर्ति है। बुढ़ीडंगाल के निवासी प्रेम हसदा बताते हैं कि जनवरी 2025 में सरकारी अधिकारी गांव आए, जमीन खोदी और जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई। इस सरकारी योजना के तहत 2024 तक ग्रामीण भारत के हर घर में नल का कनेक्शन देने का वादा किया गया था। लेकिन 2026 तक भी पानी नहीं पहुंचा। प्रेम हसदा कहते हैं, “वे फिर कभी लौटकर नहीं आए।”
उखड़ापहाड़ी में तो किसी भी तरह की प्रगति दिखाई नहीं दी, ऐसा गांव के कई निवासियों ने डायलॉग अर्थ को बताया। जल जीवन मिशन के डैशबोर्ड पर बुढ़ीडंगाल और उखड़ापहाड़ी, दोनों गांवों में इस योजना की स्थिति “प्रगति पर” (इन प्रोग्रेस) दर्ज है और यहां चार डीप ट्यूबवेल होने का भी उल्लेख है। लेकिन जमीनी स्तर पर ग्रामीण अब भी पानी के लिए अस्वच्छ जल स्रोतों पर निर्भर हैं।
डायलॉग अर्थ ने जल और स्वच्छता विभाग के जूनियर इंजीनियर रौनक कुमार से बात की, जो कहते हैं कि दोनों गांव जल जीवन मिशन के शिकारीपाड़ा-काठीकुंड फ़ुल ब्लॉक कवरेज मल्टी विलेज स्कीम के अंतर्गत आते हैं। कुमार कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट का लगभग 65% हिस्सा पूरा हो गया है पर जब तक पूरी बहु-जिला योजना का काम पूरा नहीं होता, पानी की आपूर्ति नहीं की जा सकती। कुमार बताते हैं कि वन विभाग और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास अटकी मंजूरियों के कारण निर्माण कार्य में देरी हुई है, और इसे पूरा करने की समय सीमा 2028 तक आगे बढ़ा दी गई है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, 2025 के अंत तक झारखंड में निगरानी किए जा रहे लगभग एक-तिहाई कुओं में पिछले दशक के औसत की तुलना में भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भूजल का सीमित प्राकृतिक पुनर्भरण और कृत्रिम पुनर्भरण की पर्याप्त सुविधाओं का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। वहीं, नलकूपों (ट्यूबवेल) पर बढ़ती निर्भरता ने भूजल संसाधनों पर दबाव को और बढ़ा दिया है।
इसके अलावा, दुमका में होने वाली वार्षिक वर्षा का लगभग 60% हिस्सा जून से सितंबर के बीच के मानसून महीनों में होता है। वर्ष 2017 में क्लाइमेट पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 20वीं सदी के दौरान झारखंड में वार्षिक और मानसूनी वर्षा में गिरावट का रुझान देखा गया, जिसमें दुमका उन जिलों में शामिल था जहां यह गिरावट सबसे अधिक थी। हाल के वर्षों में भी यह रुझान जारी रहा है। भारतीय मौसम विभाग के रांची केंद्र के प्रमुख अभिषेक आनंद ने हाल ही में मोंगाबे को बताया कि पिछले 25 वर्षों में झारखंड में आठ वर्ष ऐसे रहे हैं, जब वर्षा सामान्य से कम दर्ज की गई।
लगभग पूरी तरह वर्षा आधारित खेती पर निर्भर आदिवासी समुदायों के लिए यह गिरावट विनाशकारी परिणाम ला रही है। लहांती की मुख्य कार्यकारी अधिकारी बिटिया मुर्मू कहती हैं, “यह अविश्वसनीय है कि जिन समुदायों की पीढ़ियों ने अपना पूरा जीवन पानी से घिरे हुए बिताया है, वे आज इतनी गंभीर जल किल्लत का सामना कर रहे हैं।”
मुख्य समस्याएं पानी की कमी और इसमें हो रहे बदलाव की गति हैं। लेकिन बारिश में होने वाले अनिश्चित उतार-चढ़ाव से निपटना भी मुश्किल है। मुर्मू कहती हैं, “कभी बहुत अधिक बारिश होती है और कभी बिल्कुल पर्याप्त बारिश नहीं होती।” गैर-लाभकारी संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के क्लाइमेट रिस्क एंड वल्नरेबिलिटी असेसमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम के आंकड़े बताते हैं कि दुमका में वार्षिक वर्षा पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित हो गई है। 2000-2025 के बीच वर्ष-दर-वर्ष वर्षा में बदलाव 1980-1999 की अवधि की तुलना में लगभग 17% अधिक रहा।
वर्षा का स्तर 2006 में 1,822 मिमी और 2017 में 1,641 मिमी तक रहा, जबकि 2018 में यह घटकर 967 मिमी और 2022 में 959 मिमी तक पहुंच गया। कर्मकार बताते हैं, “अनियमित बारिश के कारण आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान कमजोर हो रहा है और खेती का पारंपरिक कैलेंडर भी प्रभावित हो रहा है।” इस वर्ष, उदाहरण के लिए, ग्रामीणों का कहना है कि बेमौसम बारिश के कारण लगभग आधे महुआ के फूल नहीं खिल पाए — जबकि महुआ संथाल समुदायों के लिए भोजन, आय और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
जैसे-जैसे पानी कम होता जा रहा है और बारिश अनियमित होती जा रही है, वह जमीन जो कभी अपनी निश्चितता के लिए जानी जाती थी, अब उतनी उपज नहीं दे रही।
वे जगहें जो उन्हें समझ न सकीं
तीन साल पहले, 32 साल की फुलीन हेम्ब्रम ने हैदराबाद जाने का फैसला किया, जो कि 1.11 करोड़ की आबादी वाला दक्षिण भारतीय महानगर है। उखड़ापहाड़ी में सात सदस्यों का उनका परिवार मक्का, धान, बाजरा और सब्ज़ियाँ उगाता था। लेकिन नियमित बारिश न होने की वजह से घर में कभी पर्याप्त खाना नहीं होता था। उनके भाई लवीन कहते हैं, “उन्हें जाना पड़ा क्योंकि घर में हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था।”
महानगर की चकाचौंध के बीच, फुलीन उसकी निचली बस्तियों में रहती थीं, और वेल्डर के तौर पर काम करती थीं, जिससे वो दिन के 300 रुपए कमातीं। कुछ दिन तो वह 8 बजे सुबह काम शुरू करती और आधी रात तक लगी रहतीं। रात को काम करने में वह बेचैन और असुरक्षित महसूस करतीं। वह संथाली के अलावा कोई और भाषा मुश्किल ही बोल पाती थीं, जिससे किसी से बात करना ही एक समस्या बन गई थी। “यह उनके लिए बेहद थका देने वाला था,” लवीन बताते हैं।
तीन महीने पहले, फुलीन उखड़ापहाड़ी लौट आईं, जंगलों और खेतों के बीच, शाम की गांव की बैठकों के बीच। यहाँ, उनके पास अपनी मर्ज़ी है और यह तय करने की आज़ादी है कि वे कब काम रोक सकती हैं। यहाँ, वह दोस्तों और परिवार के बीच हैं जो उन्हें समझते हैं। लवीन कहते हैं, “यहाँ खेती मुश्किल भी हो जाए, तो भी वह वापस नहीं जाएगी।”
ज़ाक्सा बताते हैं कि आदिवासियों के लिए शहरों में हमेशा के लिए बसना मुश्किल होता है, क्योंकि सदियों से वे ग्रामीण परिवेश में रहते आए हैं और वे भीड़भाड़ वाली बस्तियों या झुग्गियों में रहने के आदी नहीं हैं। वे अपनी मूल भाषा से और समुदाय में रचे-बसे सामाजिक ताने-बाने से बहुत दूर हो जाते हैं, और अक्सर बेहद कम सामाजिक जुड़ाव के साथ अकेले पड़ जाते हैं। ज़ाक्सा कहते हैं, “वे आज़ादी को सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं। वे वहाँ जाना पसंद नहीं करते जहाँ उनपर कोई लगातार हुक्म चला रहा हो। जब वे मालिकों और ठेकेदारों पर निर्भर होते हैं, तो उनकी ज़िंदगी बिल्कुल अलग ढंग से चलती है। यह बदलाव उनके लिए मुश्किल होता है।”
कर्माकर बताते हैं कि झारखंड से बाहर जाने वाले ज़्यादातर प्रवासी पंजीकृत नहीं होते, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वे कहाँ काम कर रहे हैं, या ज़रूरत पड़ने पर मदद करना मुश्किल हो जाता है। वह कहते हैं, “कभी-कभी वे बेहद ख़तरनाक हालात में फंस जाते हैं।” लाहंती को ऐसे मामले भी मिले हैं जहाँ लोग ठेकेदारों की इंतज़ाम की हुई बसों में बिना यह जाने चढ़ गए कि उन्हें कहाँ ले जाया जा रहा है। कर्माकर यह भी बताते हैं कि राज्य से बाहर काम करते हुए महिलाओं के उत्पीड़न के मामले भी सामने आए हैं।
बुढ़ीडंगाल में डूबते सूरज के नीचे, नन्ही लड़कियाँ चमकीले फ़िरोज़ी रंग के कपड़ों में खिलखिला रही हैं। उन्होंने अभी भी वही कपड़े पहने हैं जिनमें उन्होंने थोड़ी देर पहले संथाल लोक नृत्य किया था। जब वो नाच रही थीं, तब वो दमक रही थीं। जब वो कोई क़दम भूल जातीं, तो हँसी के फव्वारे छूट पड़ते। जोगेश मुर्मू अपने सामने यह चुहलबाज़ी देखकर मुस्कुरा रहे थे। बुढ़ीडंगाल के चुने हुए ग्राम प्रधान पिछले साल पुणे गए थे, जहाँ वो कंस्ट्रक्शन मजदूर के तौर पर दिन के 450 रुपए कमाते थे। वह बहुत अधिक काम करने से थक चुके थे। उससे ज़्यादा, वह अकेलापन महसूस करते थे। वह सालभर के अंदर ही लौट आए। “मैं लौट आया क्योंकि मैं अपने परिवार, अपने गांव और अपने जंगल के पास रहना चाहता हूँ,” वह कहते हैं। “यही हमारा जीने का तरीका है।”
और अभी भी, जंगलों पर बढ़ते दबाव, घरों तक अब भी न पहुंच पाए पानी, और बारिश के बेवक़्त हो जाने के बीच मुर्मू चिंतित हैं। वह कहते हैं, “अगले साल मेरी बहन की शादी है।”
इसलिए वह एक बार फिर बाहर जाएँगे, जितने की ज़रूरत है उतना कमाएँगे, और फिर लौट आएँगे।
अपने लोगों के पास। जंगल के पास। कटहल के पेड़ों के नीचे बने उस साफ़ मैदान के पास। बुढ़ीडंगाल के पास।












