जलवायु

भीषण गर्मी में घर संभालने की दोहरी मार झेल रही हैं महिलाएं

बढ़ते तापमान, और सीमित, महंगे व अपर्याप्त समाधानों के बावजूद जेंडर असमानता के कारण महिलाओं को ख़राब हालत वाले घरों में काम करना पड़ रहा है।
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<p>भारत में बहुत-सी महिलाएं तापमान बढ़ने पर भी खाना पकाना नहीं रोक सकतीं। राजस्थान की इस रसोई जैसी रसोइयां काम करने के लिए सबसे गर्म जगहों में से हैं। (तस्वीर: स्टेफ़नोबार्ज़/ अलामी) </p>

भारत में बहुत-सी महिलाएं तापमान बढ़ने पर भी खाना पकाना नहीं रोक सकतीं। राजस्थान की इस रसोई जैसी रसोइयां काम करने के लिए सबसे गर्म जगहों में से हैं। (तस्वीर: स्टेफ़नोबार्ज़/ अलामी)

कंचन अपने पति और दो बच्चों की देखभाल एक कमरे के घर में करती हैं। कमरे की दीवारें ईंट की हैं और छत धातु की चादर की।

दिन में यह कमरा रसोई और बैठक का काम करता है। रात में यही कमरा पूरे परिवार का बेडरूम बन जाता है। दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी छोर की एक बस्ती सावदा घेवड़ा में उनका काम सुबह 6 बजे अपने पति के लिए खाना बनाने से शुरू होता है।

यह एक कैच स्टोरी है

यह स्टोरी डायलॉग अर्थ के कम्युनिटी अडाप्टेशंस टू सिटी हीट प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसे बोस्टन यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी में किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट को Wellcome ने फ़ंड किया है। डायलॉग अर्थ की सभी सामग्री संपादकीय रूप से स्वतंत्र है।

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दोपहर तक, जब बिल्डिंग की टिन की छत कड़ी धूप में तप रही होती है, वह तब भी अपने स्कूल से आने वाले बच्चों के लिए ताज़ी रोटियां बना रही होती हैं।

पिछले साल सितंबर में जब कंचन अपना दोपहर का काम कर रही थीं, तब मैं जो थर्मल कैमरा ले गई थी, उसने उनके घर में सतह का तापमान 36.5C दर्ज किया, वह भी तब जब गर्मी का सबसे बुरा दौर बीत चुका था। इस साल मई में शहर में बाहर का तापमान लगभग 45C पहुंच गया था और रात का तापमान 32C के पार। यह रात दिल्ली में 14 सालों में सबसे गर्म रात थी।

“मैं नहीं करूंगी तो और कौन खाना बनाएगा?” वह कहती हैं। रात में भी बहुत कम राहत मिलती है। “जब हम सोने की कोशिश करते हैं तब भी ऐसा लगता है जैसे अभी भी दोपहर हो,” कंचन कहती हैं। उनका बेटा एयर कंडीशनर चाहता है, पर वह पूछती हैं, “पैसे कहां से आएंगे, और ऊपर से यह घर भी बहुत छोटा है।”

सावदा घेवड़ा से लगभग 50 किलोमीटर पूर्व में किशन कुंज है। इस बस्ती के अधिकतर परिवार दूसरे राज्यों से पलायन कर यहां आए हैं, और पुराने कपड़े और बर्तन बेचकर गुज़ारा करते हैं। दो युवा महिलाएं, रेशमा और मनीषा, जो यहां अपने परिवार की देखभाल करती हैं, कंचन की तरह उसी भीषण गर्मी का ज़िक्र करती हैं।

उनके घर में तो कंचन के घर जैसी ईंट की दीवारें भी नहीं हैं। दीवारों की जगह बुनी हुई चटाइयां लगी हैं। शाम को जब बाहर का तापमान थोड़ा कम होता है, रेशमा और मनीषा के भाई बाहर निकलकर दोस्तों के साथ बैठते और गपशप करते हैं, ताकि वे घर की दमघोंटू गर्मी से दूर रह सकें। 

रेशमा और मनीषा घर में ही रहती हैं। भारतीय शहरों और अनौपचारिक बस्तियों में सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को आए दिन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। स्ट्रीट लाइटें कम हैं और शाम को सार्वजनिक जगहों पर पुरुषों का ही दबदबा रहता है। “बाहर जाना हमारे लिए सुरक्षित नहीं है, और वैसे भी हम मुश्किल से ही कभी घर से बाहर निकलती हैं,” रेशमा कहती हैं। 

भारत में महिलाएं, चाहे उनकी शिक्षा का स्तर या वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो, अपने जागते समय का औसतन 46% हिस्सा बिना वेतन के देखभाल के काम में लगाती हैं – यह पुरुषों की तुलना में आठ गुना ज़्यादा है।

भारत के शहर तेज़ी से गर्म और घने हो रहे हैं। और इसका असर घर में काम करने वाली महिलाएं महसूस कर रही हैं। कई मामलों में वे अपने ख़ुद के अनुकूलन के उपाय कर रही हैं ताकि उनका जीवन थोड़ा और सहने लायक हो सके। पर ये समस्याएं झेलती महिलाओं और विशेषज्ञों का कहना है कि ठोस समाधान काफ़ी दूर लगते हैं। 

गर्मी के प्रति अनुकूलन की सीमा

2022 तक भारत की 40% शहरी आबादी अनौपचारिक बस्तियों में रहती थी। इन बस्तियों में भीषण गर्मी से बचाव के उपाय सीमित हैं। फ्रिज, पंखे और कूलर के लिए बिजली भी मिलनी मुश्किल है। बिजली के कनेक्शन अक्सर अनौपचारिक या साझा होते हैं।

जहां बिजली आपूर्ति घरों तक पहुंचती भी है, वहां यह अक्सर अनियमित होती है। भारत के शहरी इलाक़ों में हर पांच में से दो घर दिन में कम से कम एक बार अचानक बिजली कटौती का सामना करते हैं। यह संख्या कम आमदनी वाली अनौपचारिक बस्तियों में काफ़ी ज़्यादा हो सकती है।

कूलिंग उपकरण ख़रीदना और चलाना अक्सर लोगों की जेब से बाहर होता है। इस गर्मी से ठीक पहले एसी की क़ीमतें 5 से 15% बढ़ गईं, और मुंबई की अनौपचारिक बस्तियों में हुए शोध में पाया गया है कि ऊर्जा की तंगी झेल रहे परिवार बिजली का बिल क़ाबू में रखने के लिए अक्सर कूलिंग उपकरण इस्तेमाल करने से बचते हैं।

सावदा घेवड़ा, जहां कंचन रहती हैं, उन परिवारों के लिए बसाया गया था जिन्हें दिल्ली भर की अनौपचारिक बस्तियों से उजाड़ा गया था। उन्हें यहां ज़मीन आवंटित की गई, जिस पर कई लोगों ने धीरे-धीरे पक्के घर बना लिए हैं।

Three women stand in front of a house and have a chat
बाएं: दिल्ली के सावदा घेवड़ा की एक गली, जहां शहर भर की अनौपचारिक बस्तियों से लाकर बसाए गए कई लोगों ने अपने घर बना लिए हैं (तस्वीर: सोनाली वर्मा)
दाएं: दिल्ली के सावदा घेवड़ा में अपने घर के बाहर खड़ी कंचन, जो अपने पति और दो बच्चों के साथ ईंट की दीवारों और धातु की चादर की छत वाले एक कमरे के घर में रहती हैं (तस्वीर: सोनाली वर्मा)

चार साल पहले कंचन ने फ्रिज ख़रीदा। इसके लिए उन्होंने शहर भर में बिजली के बिल बांटने की पार्ट-टाइम नौकरी से कुछ पैसे बचाए थे। यह काम वह घर की देखभाल की ज़िम्मेदारियां निपटाने के बाद करती हैं। वह कहती हैं कि यह महंगा तो था पर ज़रूरी था। फ्रिज न हो तो खाना जल्दी ख़राब हो जाता है, और राशन का उनका पहले से तंग बजट संभालना और मुश्किल हो जाता।

इसके अलावा गर्मी से निपटने के उनके तरीक़े छोटे और रोज़मर्रा के हैं: वह खाना बनाने के लिए जल्दी उठती हैं, हर दो-एक घंटे में थोड़ा आराम करती हैं, कपड़ा गीला करके सिर पर रखती हैं और पंखे के सामने बैठती हैं, और शरीर में पानी की कमी पूरी करने और काम में लगे रहने के लिए छाछ पीती हैं।

ये तरीक़े उनके बचपन के नहीं हैं, वह कहती हैं। लेकिन कुछ साल पहले बगल में एक नई इमारत खड़ी हो गई, जिसने उनके घर तक पहुंचने वाली थोड़ी-बहुत हवा भी रोक दी। “घुटन होने लग गई थी अंदर,” वह कहती हैं। इसके बाद ये उपाय अपनाने पड़े। मगर निजी स्तर पर अनुकूलन की भी एक सीमा होती है, और महिलाओं के लिए यह सीमा अक्सर पुरुषों से नीची होती है।

“गर्मी के लिहाज़ से तो शरीर के स्तर पर बहुत फ़र्क़ नहीं है। असली सीमा घर है, जेंडर है, ज़िम्मेदारियों का बोझ है,” अमेरिका के हार्वर्ड टी.एच. चैन स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ता रॉबर्ट मीड कहते हैं। “महिलाओं की गर्मी से निपटने की क्षमता को सांस्कृतिक मान्यताएं और सामाजिक वजहें सीमित करती हैं।”

जब वह और उनके सहयोगी पश्चिमी भारत के राज्य गुजरात में महिलाओं के गर्मी से संपर्क का अध्ययन कर रहे थे, तब उन्होंने सलाह दी कि महिलाएं बीच-बीच में आराम करें और दिन के सबसे गर्म घंटों में काम न करें। “लेकिन असल में उनके पास कोई विकल्प नहीं है,” क्योंकि उन पर देखभाल की ज़िम्मेदारियां हैं, वह कहते हैं।

“इसे ऐसे समझिए कि वे पानी में हाथ-पैर मारकर ख़ुद को तैरते रखने की कोशिश कर रही हैं और आप उनके हाथ में एक ईंट थमा दें। वे डूबेंगी नहीं, पर सबसे आसान काम भी मुश्किल हो जाएगा,” मीड कहते हैं।

चार दीवारें और एक भी खिड़की नहीं 

सावदा घेवड़ा से क़रीब 1,400 किलोमीटर दक्षिण में मुंबई का धारावी कोलीवाड़ा इलाक़ा है।

कुछ अनुमानों के मुताबिक़ यहां दस लाख लोग रहते हैं, जो सिर्फ़ 2.6 वर्ग किलोमीटर में ठुंसे हुए हैं। यहां निर्माण की समस्या दूसरा रूप ले लेती है, पर गर्मी और उसके नतीजों की सबसे भारी मार यहां भी महिलाओं पर ही पड़ती है।

अक्सर ऊपरी मंज़िलें जोड़कर और कमरों के बंटवारे से यह बस्ती हाल के सालों में तेज़ी से फैली है। इससे सिर्फ़ लोगों के रहने का तरीक़ा नहीं बदला, बल्कि हवा के आने-जाने का तरीक़ा भी बदल गया है – या कहें कि हवा का आना ही बंद हो गया है।

“यहां पहले एक खाड़ी हुआ करती थी। खुली जगह थी, ऊंची इमारतें नहीं थीं, और हवा आर-पार निकल जाती थी,” मेरी कहती हैं। उनका परिवार कोली समुदाय से है, जो इस इलाक़े के मूल मछुआरा समुदायों में से एक है। “अब सब कुछ ठसाठस भर गया है। हर साल हर कोई नई मंज़िलें जोड़ता जा रहा है।”

Three women site outside their house
नई दिल्ली के इस इलाक़े जैसी कम आय वाली बस्तियों में महिलाओं को हाथ के पंखों का सहारा लेना पड़ता है, अगर वे महंगे एयर कंडीशनर का ख़र्च नहीं उठा सकतीं (तस्वीर: फ्रेडरिक रेनांडर / अलामी)

मेरी की पड़ोसन देवयानी गैस के चूल्हे पर उस रसोई में खाना बनाती हैं जिसकी बाहरी तीनों दीवारों में कभी खिड़कियां हुआ करती थीं, पर अब तीनों तरफ़ किसी न किसी की दीवार खड़ी है।

“इस दीवार को तोड़ें तो भी वहीं दूसरा मकान है, खिड़की नहीं लगा सकते, और बहुत घुटन होती है,” वह कहती हैं।

खाना बनाने के बाद वह अपनी कम्युनिटी बिल्डिंग की सीढ़ियों पर बैठती हैं, जहां रसोई के मुक़ाबले बस थोड़ी ही कम गर्मी होती है।

मेरी और देवयानी, दोनों ऐसे पलट चुके हालात की बात करती हैं जो बरसों में चुपके से उनके जीवन में आए हैं और अब रोज़मर्रा बन गए हैं। एक वक़्त था जब घर लौटने का मतलब छाँव और सुकून भरी ठंडक में क़दम रखना था, जब खाड़ी की हवा गलियों तक पहुंचती थी और मोहल्ला चारों तरफ़ से कंक्रीट में बंद नहीं हुआ था। अब मेन रोड पर निकलकर राहत मिलती है।

धारावी में बढ़ती भीड़-भाड़ ने कूलिंग को भी पड़ोसियों के बीच तनातनी की वजह बना दिया है। कई महिलाएं बताती हैं कि ज़्यादा पैसे वाले पड़ोसियों के एसी की गर्म हवा सीधे उनके घरों में आती है।

“घर इतने पास-पास हैं कि हमारी खिड़की के सामने किसी का एसी सीधे हमारे घर में गर्म हवा फेंकता है। पर बोल नहीं सकते, क्योंकि वो पैसे वाले हैं,” देवयानी कहती हैं।

रसोई के काम की दिक़्क़तें जेंडर से भी जुड़ी हैं। देवयानी हंसते हुए बताती हैं कि उनके पति ने कभी उनकी बिना खिड़की वाली तपती रसोई में खाना नहीं बनाया। “लेकिन ऐसा बोल नहीं सकते,” वह मज़ाक़ में कहती हैं।

मुक्ता नाईक, जो आर्किटेक्ट, शहरी योजनाकार और सस्टेनेबल फ़्यूचर्स कोलैबोरेटिव की फ़ेलो हैं, कहती हैं कि समस्या की शुरुआत घरों और शहरों की बनावट से ही होती है:

“भारत में शहरी नियोजन ने ऐतिहासिक रूप से घर के भीतर महिलाओं के इस्तेमाल की जगह को गंभीरता से नहीं लिया। घर आम तौर पर इस तरह बने ही नहीं कि घरेलू काम आसान हो सके। रसोई अक्सर बाहर रखी जाती थी, ताकि धुआं निकल सके। महिलाओं के घर के अंदर बिताए समय का हिसाब शायद ही कभी लगाया जाता है।”

बेहतर वेंटिलेशन से मदद मिल सकती है, वह कहती हैं। सिर्फ़ आर-पार की हवा नहीं, बल्कि ऊपर की ओर वेंटिलेशन भी, जो गर्म हवा के ऊपर उठकर बिल्डिंग से बाहर निकलने का रास्ता बनाए। “जहां खिड़कियां और हवा का आर-पार होना मुमकिन नहीं है, वहां मशीन से चलने वाले एग्ज़ॉस्ट के साथ खड़े शाफ़्ट लगाए जा सकते हैं,” नाईक समझाती हैं। इसे मौजूदा इमारतों में भी जोड़ा जा सकता है, और इससे गर्मी और घर के भीतर का वायु प्रदूषण, दोनों से एक साथ निपटा जा सकेगा।

बिना पंखे और बिजली के चलने वाले पैसिव समाधान भी मौजूद हैं। 2021 के एक अध्ययन ने मुंबई के अंधेरी ईस्ट में एक कमरे के कम-आमदनी वाले घर में एक अपेक्षाकृत सस्ता उपाय परखा। कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से शोधकर्ताओं ने देखा कि घर की छत पर एक छोटी चिमनी लगाई जाए तो क्या होगा। चिमनी का एक तरफ़ का हिस्सा गर्मी सोखने के लिए काला रंगा गया था और बाक़ी हिस्सा अर्ध-पारदर्शी रखा गया, ताकि रोशनी अंदर आ सके। नतीजे उम्मीद जगाने वाले रहे: सिमुलेशन में चिमनी ने इतनी गर्म हवा बाहर खींच ली कि कमरे का तापमान 3C से 4C गिर गया।

पर पहले से बनी इमारतों में बाद में समाधान जोड़ने की पहल सरकार से होने की उम्मीद कम ही है। नाईक बताती हैं कि ये लोगों की ख़ुद बनाई हुई बस्तियां हैं, और अनौपचारिक बस्तियों के किसी भी तरह के सुधार के मामले में भारत का रिकॉर्ड ख़राब रहा है। “ज़्यादा व्यावहारिक रास्ता निजी स्तर पर, परिवारों के अपनाने का है, यानी लोग अपने घरों में ख़ुद बदलाव करें, बशर्ते उन्हें तकनीकी मदद और घर सुधारने के लिए वित्तीय मदद मिले।”

नाईक के मुताबिक़ सब्सिडी वाले कूलिंग उपकरण, लागत घटाने के लिए उपकरणों का मानकीकरण, और उद्योगों को सस्ते कूलिंग यूनिट बनाने के लिए प्रोत्साहन भी मददगार होंगे।

जिन घरों में एसी है, वहां भी ठंडक सब तक बराबर नहीं पहुंचती।

सावदा घेवड़ा के एक नए सिरे से मरम्मत कराए गए घर में रहने वाली मुमताज़ ने हाल ही में एसी ख़रीदा, क्योंकि “बरसात में कूलर काम नहीं करता और बदन चिपचिपा हो जाता है।”

लेकिन एसी तभी चलता है जब शाम को उनका बेटा घर आता है, और फिर रात भर चलता है। उससे पहले के घंटों में, जब उनकी बहू दोपहर भर खाना बनाती और साफ़-सफ़ाई करती है, काम बिना एसी के ही चलाना पड़ता है। उसे ज़्यादा देर चलाने का ख़र्च परिवार की पहुंच से बाहर है। मुमताज़ एक और वजह के बारे में भी सीधे-सपाट ढंग से बात करती हैं: पुरुष बाहर कड़ी मेहनत करते हैं, इसलिए लौटने पर घर ठंडा होना चाहिए।

बिना व्यवस्था के गुज़ारा

गर्मी सिर्फ़ बेचैनी नहीं लाती। दिल्ली और मुंबई भर में महिलाएं बताती हैं कि घर के अंदर लंबे समय तक गर्मी झेलने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है, पर उनके लक्षणों का सिलसिला शायद ही कभी मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज होता है। सावदा घेवड़ा के पास कोई सरकारी अस्पताल नहीं है। एक छोटी डिस्पेंसरी है, और उसके आगे एक निजी डॉक्टर, उन परिवारों के लिए जो उसका ख़र्च उठा सकते हैं।

रेशमा बताती हैं कि दिन के सबसे गर्म घंटों में खाना बनाते समय उनका ब्लड प्रेशर गिर जाता है, जिससे चक्कर आते हैं और उल्टी होती है। मनीषा गर्मी की वजह से नाक से ख़ून आने की बात करती हैं। मुंबई की एक और महिला बताती हैं कि बार-बार टूटी नींद के बाद जब वह सुबह उठती हैं तो उनके पैर सूजे होते हैं। उनके मुताबिक़ यह उन निशानियों में से एक है जिनसे उन्हें पता चलता है कि गर्मी हद पार कर चुकी है।

2024 में दिल्ली और मुंबई समेत 10 भारतीय शहरों पर हुए एक अध्ययन में रोज़ाना होने वाली मौतों में 14.7% की बढ़ोतरी हीटवेव से जुड़ी पाई गई। अनुमान लगाया गया कि अध्ययन वाली जगहों पर हर साल हीटवेव की वजह से 1,100 से ज़्यादा मौतें होती हैं। लेकिन भारत में मौतों के सरकारी आंकड़े कम दर्ज किए जाते हैं और उनकी ठीक से निगरानी नहीं होती, और ख़राब बने शहरी घरों में रहने वाली कई महिलाएं जिस बीमारी की मार झेलती हैं, वह इनमें दर्ज ही नहीं हो पाती।

एक निवासी, ज़रीना, बताती हैं कि खाना बनाते समय ठंडक के लिए वह लगातार अपने कपड़ों पर पानी छिड़कती रहती हैं। लेकिन कपड़े भी समस्या का हिस्सा हैं। “गीले कपड़ों की वजह से मेरे पूरे बदन पर दाने निकल आए हैं,” वह कहती हैं। जेंडर मान्यताओं के मुताबिक़ उन्हें दिन भर पूरी तरह ढके रहना पड़ता है, जबकि पुरुष घर में और साझा जगहों पर, ख़ासकर गर्मी में, आम तौर पर बनियान पहने या बिना शर्ट के घूमते हैं।

उसी इलाक़े की एक और गृहिणी सविता बताती हैं कि गर्म दोपहरों में वह फ्रिज खोलकर उसके सामने बैठ जाती हैं। “मेरे पति डांटते हैं कि ठंडक बर्बाद कर रही हूं,” वह हंसती हैं, “पर फ्रिज थोड़ा बड़ा होता तो मैं उसके अंदर ही बैठ जाती।”

भारत के घरों के भीतर की गर्मी का संकट आज एक-एक महिला संभाल रही है, ऐसे घरों के अंदर जो गर्मी को इस तरह क़ैद कर लेते हैं जिसे पुरुष शायद ही कभी महसूस करते हैं। इसे गीले कपड़ों से संभाला जा रहा है, छाछ से, पंखों से, और फ्रिज के खुले दरवाज़े से।

“कितनी भी गर्मी हो, कोई बिना खाए रह सकता है?” धारावी की एक 80 साल की महिला कहती हैं, जो अपना नाम नहीं बताना चाहती थीं। “कोई नहीं रह सकता। तो हमें काम करना ही पड़ेगा, कितनी भी गर्मी हो।”

सोनाली वर्मा सितंबर 2025 से मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद की निम्न और मध्यम आय वाली बस्तियों में जा रही हैं और अलग-अलग उम्र और समुदायों की गृहिणियों से गर्मी, थकान और उनसे निपटने के तरीक़ों पर बात कर रही हैं। इस लेख की रिपोर्टिंग में सहयोग के लिए वह प्रीतिश बाली, गोदरेज डिज़ाइन लैब्स, महिला हाउसिंग ट्रस्ट, नज़रिया आर्ट्स कलेक्टिव, सीड्स इंडिया और अर्ब्ज़ कलेक्टिव का आभार जताना चाहती हैं।

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