जलवायु गर्म होते भारत में, कपड़े भी बढ़ा रहे हैं जातीय असमानता गर्मी से अनुकूलन का उपाय बनते सूती हवादार कपड़े बहुत से दलित परिवारों की पहुँच से बाहर हैं। हिन्दी हिन्दी 中文 English Share this article × Copy link to page Copy link to page × पुन: प्रकाशन अगर आप हमारी प्रकाशन नीति की शर्तों या सामग्री का उपयोग करने की अनुमति के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो [email protected]पर हमें संपर्क करें। दिल्ली के शाहबाद डेयरी में अपने घर के बाहर पूनम (दाएँ) और उनकी सास कांता देवी. जहाँ बस्ती के भीड़भाड़ और सीमित वेंटिलेशन ने भीषण गर्मी के असर को और भी बुरा कर दिया है. (तस्वीर: शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) शालिनी कुमारी जून 17, 2026July 26, 2026 उत्तर-पश्चिमी दिल्ली की बस्ती शाहबाद डेयरी की संकरी गलियों में, एक दूसरे से बिल्कुल सटे मकानों का एक कंक्रीट का जाल है। पेड़ शायद ही कहीं इक्के-दुक्के हैं। इन तंग और घुटनभरी गलियों में मुश्किल से हवा का कोई झोंका गुज़र पाता है, और दोपहर तक झुलसाने वाली गर्मी से बचना नामुमकिन हो जाता है। अगल बगल के घरों में रहने वाली पूनम और उनकी देवरानी/जेठानी रितिका अपने बच्चों को कड़ी धूप में बाहर खेलने से रोकती हैं. हालांकि बाहर का तापमान 40C है पर घर के अंदर गर्मी बहुत ज़्यादा महसूस होती है। उनके घरों की टिन और कंक्रीट की छतें गर्मी को रोककर रखती हैं। खिड़कियाँ नहीं हैं, जिसके कारण वेंटिलेशन नहीं के बराबर है। पूनम और रितिका अगर पुरुष होतीं, तो वो छोटे या ढीले कपड़े पहन लेतीं। पर परंपरा के अनुसार उन्हें अपना शरीर कई परतों से ढकना पड़ता है। “इस मटेरियल से पसीना और आता है। यह पसीना नहीं सोखता,” सिंथेटिक कपड़े से बनी अपनी सलवार क़मीज़ और दुपट्टे की ओर इशारा करते हुए पूनम कहती हैं। यह तीन कपड़ों का एक परिधान होता है, जिसमें एक लंबा कुर्ता, टखने तक का पजामा और एक दुपट्टा शामिल होता है – जिसे कंधों, गर्दन और कभी-कभी सिर पर ओढ़ा जाता है। डायलॉग अर्थ से बात करने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि जैसे जैसे हीटवेव और लगातार और भीषण होती जा रही हैं, सूती(कॉटन) या सनी (लिनेन) जैसे प्राकृतिक कपड़े पहनना गर्मी से अनुकूलन का तरीका बनकर उभर रहा है। पर पूनम और रितिका जैसे बहुत से लोगों के लिए उन्हें खरीदना एक बड़ी बात है क्योंकि उनकी कीमत सिंथेटिक कपड़ों के मुक़ाबले दोगुनी होती है। उनका परिवार दलित समुदाय से है, जो ऐतिहासिक रूप से शोषित जातियों का समूह है। हाई-स्कूल पूरा करने के बाद भी उनके ससुर पाले राम को अपनी जाति के कारण सफ़ाई के काम में धकेल दिया गया। जहाँ वो अपने पिता और अपने दादा की तरह ही सीवर की सफ़ाई करने लगे। उनके बेटे भी यही काम करते हैं, और परिवार के आर्थिक हालात बेहतर आमदनी और सुरक्षित पेशों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंचित रहने की कहानी कहते हैं। (जिन दलित परिवारों से डायलॉग अर्थ ने बात की, वो और भी जातीय भेदभाव से बचने के लिए उपनामों का इस्तेमाल नहीं करते।) परिवार की आमदनी से घर का खर्च मुश्किल से चल पाता है, और कपड़ों के लिए थोड़े ही पैसे बचते हैं। शाहबाद डेरी में तंग गलियाँ और ठसाठस भरी बस्ती हवा को पार होने से रोकती हैं. यहाँ बहुत से परिवार दिल्ली की बढ़ती भीषण गर्मी में ख़ुद को ठंडा रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं (तस्वीर: शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) दिल्ली में, भीषण गर्मी में काम कर रहे बहुत से कामगार जिनमें सफ़ाई और अनौपचारिक मज़दूर शामिल हैं, अभी भी ऐतिहासिक रूप से हाशियाकृत जातीय समुदायों से आते हैं। द हिंदू द्वारा 2024 में किया गया एक विश्लेषण कहता है कि भारत के 70% सीवर और सेप्टिक टैंक कामगार शोषित जातियों से हैं। गर्म परिस्थितियों में लंबे समय तक शारीरिक रूप से मुश्किल काम करने वालों के लिए कपड़े बहुत मायने रखते हैं। “पर जब आमदनी सीमित हो तब भोजन और छत ज़्यादा ज़रूरी हो जाते हैं,” ये अफ़रोज़ फरीद कहती हैं जो केरल की राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) में टेक्सटाइल डिज़ाइन विभाग में प्रोफेसर हैं। राहत की कीमत सूती (कॉटन) और सनी (लिनेन) जैसे प्राकृतिक कपड़े अपनी बेहतर नमी सोखते और हवादार होने के कारण गर्म मौसम में पसंद किए जाते हैं, फरीद डायलॉग अर्थ को बताती हैं. पॉलीस्टर और नाइलॉन जैसे सिंथेटिक मटेरियल भीषण गर्मी में असहज कर सकते हैं, जिसका असर ख़ासकर लंबे समय तक खुले में और ख़राब वेंटिलेशन वाले घरों में रहनेवाले लोगों पर और अधिक होता है। रितिका के कंक्रीट के घर में इकलौता सीलिंग फैन गर्म दिन पर गर्म हवा दे रहा है। (तस्वीर: शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) पूनम के घर में दिन भर धूप से गर्म होती टिन की छत से लटकता पंखा घर के अंदर बाहर के तापमान से भी अधिक गर्मी महसूस कराता है। (तस्वीर: शालिनी कुमारी/ डायलॉग अर्थ) पर भारत में पॉलीस्टर और कॉटन की कीमतों में भारी अन्तर है। दलित परिवार इस अन्तर को पार करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पाले राम एक महीने के लगभग 35,000 रुपए कमाते हैं, वहीं पूनम के पति, जो बस कंडक्टर भी हैं और सीवर की सफ़ाई भी करते हैं, लगभग 40,000 रुपये तक कमाते हैं। दोनों की कुल आमदनी भी सात सदस्यों के इस परिवार के घरेलू खर्च, और तीन बच्चों की पढ़ाई की देखरेख मुश्किल से कर पाती है। “एक सूती सलवार सूट (सलवार क़मीज़ और दुपट्टे के साथ) 1,000 रुपए से अधिक का मिलता है, वहीं ब्लेंडेड यानी मिश्रित या सिंथेटिक कपड़े आपको सिर्फ़ 300 रुपए में मिल जाएँगे।” रिया कहती हैं, जो शाहबाद डेयरी के एक दलित परिवार से हैं। उनके पति नगर की सीवर लाइंस का काम करते हैं, और महीने के 15,000 रुपए कमाते हैं। उनके पाँच बच्चे हैं, और उनके लिए हवादार मटेरियल से बने कपड़े खरीदना एक ऐसा खर्च है जिसके बारे में उनके परिवार ने नहीं सोचा था। “आरामदायक कपड़ों तक असमान पहुँच ग़रीबी की नहीं बल्कि जातिगत समस्या है,” बेज़वाड़ा विल्सन कहते हैं, जो सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं। यह भारतीय संगठन मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला उठाने की प्रथा जिसमे सीवर से मानव मल को हाथों से साफ़ करना पड़ता है) को ख़त्म करने के लिए अभियान चला रहा है। पूनम कहती हैं कि सिंथेटिक कपड़े जिन्हें वह ख़रीद पाती हैं, अत्यधिक गर्मी वाले दिनों में असहज महसूस होते हैं। (शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) कम खर्च में ख़ुद को ठंडा रखने के लिए, रिया कॉटन के कपड़ों के साथ सस्ते सिंथेटिक कपड़े मिलाकर पहनती हैं। (तस्वीर: शालिनी कुमारी/ डायलॉग अर्थ) ऐतिहासिक रूप से कपड़े जातीय भेदभाव का औजार रहे हैं, फरीद बताती हैं। वह कहती हैं, “पहले जातीय भेदभाव उन्हें अपमानित करने के लिए कम कपड़े पहनने देने पर केंद्रित था। पर आज, वे अपनी आर्थिक स्थिति के कारण उचित कपड़े नहीं ख़रीद पा रहे हैं।” “भारत में वर्ग हमेशा…जाति से प्रभावित होता है। आप जाति को वर्ग से अलग नहीं कर सकते,” जाति-विरोधी कार्यकर्ता और डिज़ाइनर जय सागठिया डायलॉग अर्थ को बताते हैं। दोहरा भेदभाव हाशियाकृत समुदाय “दोहरा भेदभाव” झेलते हैं – आर्थिक अभाव और जाति-आधारित बहिष्कार जिससे यह तय होता है कि कहाँ सुविधाएं, बुनियादी ढांचे और गरिमा मौजूद है, विल्सन कहते हैं। वह भी दलित समुदाय से आते हैं। वह बताते हैं कि जाति से जुड़े पेशों में काम कर रहे बहुत से परिवार सेकंड-हैंड कपड़ों या कम-आमदनी वाले ग्राहकों के लिए लगे स्थानीय बाजारों पर निर्भर हैं। स्थानीय बाजारों से अक्सर इन धारणाओं का पता चलता है कि गरीब समुदाय क्या ख़रीद पाने की क्षमता रखते हैं। विल्सन जोड़ते हैं, “हमारे घरों के पास सूती कपड़े मिलते ही नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि हम उनका इस्तेमाल नहीं करते। बेज़वाड़ा विल्सन, दिल्ली में अपने ऑफिस में। वह एक दलित कार्यकर्ता और सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं। संगठन मैनुअल स्कैवेंजिंग को मिटाने के लिए अभियान चला रहा है। (तस्वीर: शालिनी कुमारी/ डायलॉग अर्थ) भारत दुनियाभर में कॉटन के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है और यह उद्योग 5 करोड़ लोगों तक को रोज़गार देता है। पर उसके बावजूद सूती कपड़े कई कम आमदनी वाले परिवारों की पहुँच से बाहर हैं। सागठिया कहते हैं कि कई शिल्पकार समुदायों का दौरा करते हुए वे हाशियाकृत समुदायों के कुछ शिल्पकारों से मिले जिनके बनाए बारीक बनावट वाले कपड़े ऐसे दामों पर बिकते हैं जिन्हें वह ख़ुद नहीं ख़रीद सकते। “जो लोग ये कपड़े बना रहे हैं, वही ख़ुद इन्हें नहीं पहन सकते,” वह कहते हैं। कपड़ा उद्योग को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं के माध्यम से सिंथेटिक कपड़ों का चलन और भी आम हो सकता है। 2021 में सरकार ने कंपनियों को पॉलीस्टर, एक्रिलिक और विस्कोस जैसे मानवनिर्मित(सिंथेटिक) कपड़ों का उत्पादन बढ़ाने के लिए कुल 10,000 करोड़ रुपए से भी अधिक के प्रोत्साहन देने शुरू किए। सरकारी अधिकारियों ने उद्योग के प्रकाशन ‘अपैरल रिसोर्सेज’ को इस महीने की शुरुआत में बताया कि इस योजना को और भी अधिक आवेदकों को शामिल करने के लिए कई सालों तक बढ़ाया जा सकता है। गर्मी का असमान असर 60 साल के पाले राम हर दिन लगभग पाँच से छह घंटे सिंथेटिक कपड़ों से बनी यूनिफार्म पहनकर अपना सफ़ाई का काम करते हैं जिसमें तपती पक्की सतहों के किनारे खुली नालियों में से फावड़े से कचरा हटाना होता है। हालांकि यह कपड़ों के ऊपर पहनी जाने वाली एक साधारण वेस्ट है पर यह गर्मी सोखती है, वह कहते हैं। वह कहते हैं, “कभी कभी यह वेस्ट मेरा दम घोंटती है। जब मैं नरम कपड़े पहनता हूँ जिससे बाहर काम करने के दौरान मेरे शरीर को हवा लग सके, तब यह आसान होता है।” गर्मी के इस मौसम में पाले राम दो बार बेहोश हो चुके हैं, उन्हें अक्सर चक्कर आते हैं और वह आँखों में दर्द की शिकायत करते हैं। उन्हें लगातार डायरिया भी हो जाता है। यह लक्षण हीट एग्जॉशन या गर्मी से थकावट से जुड़े हुए हैं। उनके पास दो जर्जर सूती कुर्ता पायजामा के सेट हैं – एक लंबा कुर्ता और एक ढीला पजामा – जिन्हें वह बारी-बारी पहनकर काम करने जाते हैं। वह कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं अपने कपड़ों का अगला सेट कब ख़रीदूँगा।” सफ़ाई कर्मचारी पाले राम कहते हैं कि बढ़ते तापमान में खुले में काम करना मुश्किल होता जा रहा है।(तस्वीर: शालिनी कुमारी/ डायलॉग अर्थ) सागठिया के अनुसार, यह तकलीफ़ दिखाती है कि श्रम की क्या कीमत लगाई जाती है और किसके आराम और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। वह कहते हैं, “अगर आप एक शोषित जाति से हैं तो आपका शरीर ही …डिस्पोजेबल है।” गर्मी से सुरक्षा को शायद ही कभी अनौपचारिक कामगारों, जिनमें ज्यादातर शोषित जातियों से आते हैं, की पेशेगत सुरक्षा का हिस्सा माना जाता है। कपड़ों के अलावा बहुत सी वजहें पाले राम जैसे कर्मचारियों के लिए हीट एक्सपोजर या गर्मी के प्रकोप को और बढ़ा देती हैं, विल्सन कहते हैं। इनमें घरों की ख़राब हालत, सीमित पोषण, अनियमित नींद और पानी तक सीमित पहुँच शामिल हैं। जातीय भेदभाव हीट जोखिम को और बढ़ा देते हैं, वह कहते हैं। छुआछूत की जारी प्रथाओं के कारण आमतौर पर सफ़ाई कर्मचारी काम के दौरान पीने का पानी तक नहीं माँग सकते। अपनी फ्लोरोसेंट वेस्ट पहने पाले राम। वह कहते हैं कि अपने सूती कपड़ों के ऊपर यह सिंथेटिक परत पहनना दिल्ली की गर्मी में असहज करता है. (तस्वीर: शालिनी कुमारी/ डायलॉग अर्थ) घर पर भी यह कोई आसान नहीं है. महीनों की बचत के बाद परिवार ने एक सेकंड-हैंड कूलर ख़रीदा पर “यह हवा को और उमस से भर देता है,” पूनम कहती हैं। फिर इसमें जेंडर का भी पहलू जुड़ जाता है. महिलाओं के लिए शालीनता के नियम आड़े आते हैं, जिससे उन्हें कपड़ों के ऊपर साड़ी, दुपट्टा और काम के यूनिफार्म पहनने पड़ते हैं. “इन स्थितियों में जितनी परतें एक महिला पहनती है वो बहुत ज़्यादा है जिससे वो गर्मी से और प्रभावित होती हैं,” फरीद कहती हैं।“हम यह ध्यान रखते हैं कि कम से कम हमारे बच्चे सूती कपड़े पहने. उनके शरीर ज़्यादा संवेदनशील हैं,” पूनम कहती हैं। इच्छा और टिकाऊपन सिंथेटिक कपड़ों पर निर्भरता ज़रूरी तौर पर पसंद का मामला नहीं है, विल्सन कहते हैं। “लोग असुविधा के बावजूद पॉलीस्टर और नाइलॉन के कपड़े चुनते हैं क्योंकि वो अधिक टिकाऊ होते हैं जिससे उन्हें बार बार कपड़े नहीं ख़रीदने पड़ते,” वह कहते हैं। सूती कपड़े लगातार इस्तेमाल करने और धोने से सिंथेटिक कपड़ों की तुलना में जल्दी फट जाते हैं। कंसल्टिंग फर्म आईएमआरसी की मार्केट रिसर्च भारत में पॉलीस्टर कपड़ों के वर्चस्व की ओर इशारा करती है, जिसके अनुसार टिकाऊपन, सस्ते होने और विविध उपयोगों के चलते इस माँग के कारण इसकी बाजार में 62% हिस्सेदारी है। शाहबाद डेरी के निवासी अक्सर घंटों बिताकर पीने का थोड़ा सा पानी जुटा पाते हैं, जिसके कारण कपड़े धोने जैसे कामों के लिए मुश्किल ही कुछ बचता है (तस्वीर: शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) जिन दलित परिवारों से डायलॉग अर्थ ने बात की उन्होंने माना कि कई बार धोने के बाद सूती कपड़ा मुलायम होता है जिससे उसे पहनना और आरामदायक हो जाता है। पर पूनम कहती हैं कि कपड़े धोना उनके परिवार के लिए प्राथमिकता नहीं है क्योंकि उनकी पानी की दैनिक आपूर्ति उनकी ज़रूरतों की आधी ही है, जिसमें से ज्यादातर पीने के लिए खर्च होती है। कपड़ों पर और विचार की ज़रूरत विल्सन कहते हैं, “गर्मी शोषित समुदायों को एक और जोखिम की परत में धकेल रही है।” वह यह भी जोड़ते हैं कि हीटवेव का अनुभव सबके लिए एक जैसा नहीं है। विल्सन और फरीद दोनों नोट करते हैं कि गर्मी से बचाव की बातचीत आमतौर पर बुनियादी ढांचों जैसे पंखों, कूलर, और एयर कंडीशनिंग पर केंद्रित रहती है जबकि कपड़ों को शायद ही कभी सुरक्षा के तरीके की तरह देखा जाता है। फिर भी हाशियाकृत समुदायों के जो लोग खुले में लंबे समय तक काम करते हैं, और जो पहले ही गर्मी से राहत पाने में बहुत सी अड़चनों का सामना करते हैं, उनके लिए अक्सर कपड़े ही ऊँचे तापमानों से पहली सुरक्षा हैं।“वही हैं जो खुले आसमान के नीचे, भीषण मौसमी हालातों में काम कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से उनका कार्यस्थल पर हीट एक्सपोज़र सिर्फ़ और बढ़ेगा,” फरीद कहती हैं। “आख़िरी इंसान जो फसल काट रहा है, जो खेतों में काम कर रहा है, जो तपती धूप में काम कर रहा है उसे कोई ठीक से नहीं देख रहा,” हमें इन परिस्थितियों के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए कपड़ों की ज़रूरत है। सागठिया के अनुसार, कपड़ों को आधारभूत अधिकारों से अलग नहीं किया जा सकता, “यह हमारे रोटी, कपड़ा और मकान का हिस्सा है,” वह कहते हैं। हालांकि, डायलॉग अर्थ से बात करने वाले विशेषज्ञ प्राकृतिक कपड़ों को समाधान की तरह देखने से आगाह करते हैं। कॉटन और लिनेन आमतौर पर सिंथेटिक कपड़ों की तुलना में अधिक हवादार तो होते हैं, पर वे खुले में काम कर रहे कर्मचारियों को भीषण तापमान में लंबे समय तक रहने के खतरों से पूरी तरह नहीं बचा सकते। फरीद कहती हैं कि पसीने को कपड़ों से सूखने में लंबा समय लगता है जिससे वो इस दौरान और भारी हो जाते हैं। रितिका का चार महीने का बेटा अपनी नानी के भेजे हुए सूती कपड़े पहन कर सो रहा है। परिवार आर्थिक सीमाओं के बाद भी बच्चों के लिए हवादार कपड़ों को प्राथमिकता देता है। (शालिनी कुमारी/डायलॉग अर्थ) फरीद कहती हैं, “एक अधिक समझदार विकल्प इन रेशों का एक सावधानीपूर्वक मिश्रण है, जिससे पहनने वालों को आरामदायक अनुभव हो।” फरीद के अनुसार, ब्लेंडेड होने का मतलब वो शुद्ध सूती कपड़ों की तुलना में सस्ते भी होंगे। शाहबाद डेयरी में रितिका के घर में, उनका चार महीने का बच्चा जाग गया है। वो उसे कूलर के सामने लाकर चुप कराने की कोशिश करती हैं पर बच्चा दोपहर भर से रोए जा रहा है। दोपहर बीतने के बाद भी गर्मी कम नहीं होती। हर कुछ महीनों में, रितिका की माँ बच्चों के लिए सूती कपड़े भेजती हैं। “उन्हें सिंथेटिक कपड़े पहनाना नामुमकिन है,” वह कहती हैं। “वो उन्हें जलन के चलते निकाल देते हैं। और वो सो भी नहीं पाते।” लगातार पढ़ें आलेख स्वास्थ्य "आज भी यह मानना विवाद का विषय है कि गर्मी जान ले सकती है" आलेख हीट अडॉप्टेशन भीषण गर्मी में लोकतंत्र: क्या गर्मियों में होने वाले चुनाव खत्म होने चाहिए? आलेख वैश्विक तापन भीषण गर्मी में लोकतंत्र: गर्म होती जलवायु में चुनाव आलेख हीट अडॉप्टेशन शहरों की हीट प्लानिंग की खामियों का बोझ कमज़ोर वर्ग पर आलेख खनन खनन के बढ़ते दबाव के बीच अरावली बचाने की लड़ाई आलेख हीट अडॉप्टेशन चर्चा: COP30 में स्वास्थ्य पर कितना गंभीर रहा एजेंडा? आलेख मछली पालन शार्क पहचान में कठिनाई, भारतीय मछुआरों में जुर्माने को लेकर चिंता आलेख स्वास्थ्य बढ़ती गर्मी से परेशान रेहड़ी-पटरी वाले